मंगलवार, 6 दिसंबर 2016

वक़्त कितना क्या पता रिश्तों को सुलझाने तो दो ...

ये अँधेरा भी छंटेगा धूप को आने तो दो
मुट्ठियों में आज खुशियाँ भर के घर लाने तो दो

खुद को हल्का कर सकोगे ज़िन्दगी के बोझ से
दर्द अपना आँसुओं के संग बह जाने तो दो

झूम के आता पवन देता निमंत्रण प्रेम का
छू सके जो मन-मयूरी गीत फिर गाने तो दो

बारिशों का रोक के कब तक रखोगे आगमन
खोल दो जुल्फें घटा सावन की अब छाने तो दो

सब की मेहनत के भरोसे आ गया इस मोड़ पर
नाम है साझा सभी के तुम शिखर पाने तो दो

पक चुकी है उम्र अब क्या दोस्ती क्या दुश्मनी
वक़्त कितना क्या पता रिश्तों को सुलझाने तो दो ...

मंगलवार, 29 नवंबर 2016

कहते हैं मुद्दतों से हमें जानते हैं वो ...

हम झूठ भी कहेंगे तो सच मानते हैं वो
कहते हैं मुद्दतों से हमें जानते हैं वो

हर बात पे कहेंगे हमें कुछ नहीं पता
पर खाक हर गली की सदा छानते हैं वो

कुछ लोग टूट कर भी नहीं खींचते कदम
कर के हटेंगे बात अगर ठानते हैं वो

बारिश कभी जो दर्द की लाता है आसमां
चादर किसी याद की फिर तानते हैं वो

तो क्या हुआ नज़र से नहीं खुल के कह सके

भाषा को खूब प्रेम की पहचानते है वो ...

मंगलवार, 22 नवंबर 2016

इस शहर की शांति तो भंग है ...

नाम पर पूजा के ये हुड़दंग है
इस शहर की शांति तो भंग है

लूटता है आस्था के नाम पर 
अब कमाने का निराला ढंग है

हर कोई आठों पहर है भागता  
जिंदगी जैसे के कोई जंग है

घर का दरवाज़ा तो चौड़ा है बहुत
दिल का दरवाज़ा अगरचे तंग है

आइना काहे उसे दिखलाए हैं
उड़ गया चेहरे का देखो रंग है

युद्ध अपना खुद ही लड़ते हैं सभी
जिंदगी में कौन किसके संग है

सोमवार, 14 नवंबर 2016

इन आँखों से ये ख्वाब ले लो ...

अपने ख़त का जवाब ले लो
इन हाथों से गुलाब ले लो

चाहो मिलना कभी जो मुझ से
दिल की मेरे किताब ले लो

अनजाने ही दिए थे जो फिर
उन ज़ख्मों का हिसाब ले लो

मिलने वाला बने न दुश्मन
चेहरे पर ये नकाब ले लो

अमृत सा वो असर करेगी
उनके हाथों शराब ले लो

काटेंगे ये सफ़र अकेला
इन आँखों से ये ख्वाब ले लो

मंगलवार, 8 नवंबर 2016

अम्मा का दिल टूट गया ...

पुरखों का घर छूट गया
अम्मा का दिल टूट गया

दरवाज़े पे दस्तक दी
अन्दर आया लूट गया

मिट्टी कच्ची होते ही
मटका धम से फूट गया

मजलूमों की किस्मत है
जो भी आया कूट गया

सीमा पर गोली खाने
अक्सर ही रंगरूट गया

पोलिथिन आया जब से
बाज़ारों से जूट गया 

बुधवार, 2 नवंबर 2016

गड्ढे में ...

मौत ने कैसा रंग जमाया गड्ढे में
मिट्टी को मिट्टी से मिलाया गड्ढे में

नेकी कर गड्ढे में डालो अच्छा है
वर्ना जितना साथ निभाया गड्ढे में

पहले तो गज भर खोदो मिल जाता था
पानी के अब खूब रुलाया गड्ढे में

मेहनत से बिगड़ी बातें बन जाती हैं
मकड़ी ने है पाठ पढ़ाया गड्ढे में

ग्रहण लगा था बचपन में तब अब्बू ने
पानी भर के चाँद दिखाया गड्ढे में

जीवन भर का साथ मगर मौत आने पर
जल्दी जल्दी हमें सुलाया गड्ढे में

घर जाते तक दुनियादारी जाग गई
मिल के डाले फूल भुलाया गड्ढे में 

बुधवार, 26 अक्तूबर 2016

हम भी किसी हसीन की आहों में आ गए ...

कुछ यूँ फिसल के वो मेरी बाहों में आ गए 
ना चाहते हुए भी निगाहों में आ गए

सच की तलाश थी में अकेला निकल पड़ा
जुड़ते रहे थे लोग जो राहों में आ गए 

हम भीगने को प्रेम की बरसात में सनम
कुछ देर बादलों की पनाहों में आ गए

था प्रेम उनसे उनके लगे झूठ सच सभी
ना चाह कर भी उनके गुनाहों में आ गए

मशहूर हो गया है हमारा भी नाम अब
हम भी किसी हसीन की आहों में आ गए 

गुरुवार, 20 अक्तूबर 2016

अपने किए पे बैठ कर रोया नहीं करते ...

अपने असूलों को कभी छोड़ा नहीं करते
साँसों की ख़ातिर लोग हर सौदा नहीं करते

महफूज़ जिनके दम पे है धरती हवा पानी
हैं तो ख़ुदा होने का पर दावा नहीं करते

हर मोड़ पर मुड़ने से पहले सोचना इतना
कुछ रास्ते जाते हैं बस लौटा नहीं करते

इतिहास की परछाइयों में डूब जाते हैं
गुज़रे हुए पन्नों से जो सीखा नहीं करते

आकाश तो उनका भी है जितना हमारा है
उड़ते परिंदों को कभी रोका नहीं करते

जो हो गया सो हो गया खुद का किया था सब
अपने किए पे बैठ कर रोया नहीं करते
  

गुरुवार, 13 अक्तूबर 2016

कहीं अपने ही शब्दों में न संशोधन करो तुम ...

दबी है आत्मा उसका पुनः चेतन करो तुम
नियम जो व्यर्थ हैं उनका भी मूल्यांकन करो तुम

परेशानी में हैं जो जन सभी को साथ ले कर    
व्यवस्था में सभी आमूल परिवर्तन करो तुम

तुम्हें जो प्रेम हैं करते उन्हें ठुकरा न देना
समय फिर आए ना ऐसा की आवेदन करो तुम  

अभी भी मान लो सच को बहुत आसान होगा
कहीं लक्षमण की रेखा का न उल्लंघन करो तुम

समझदारी से अपनी बात सबके बीच रखना
कहीं अपने ही शब्दों में न संशोधन करो तुम 

रविवार, 25 सितंबर 2016

माँ ...

माँ को गए आज चार साल हो गए पर वो हमसे दूर है शायद ही किसी पल ऐसा लगा ... न सिर्फ मुझसे बल्कि परिवार के हर छोटे बड़े सदस्य के साथ माँ का जो रिश्ता था वो सिर्फ वही समझ सकता है ... मुझे पूरा यकीन है जब तक साँसें रहेंगी माँ के साथ उस विशेष लगाव को उन्हें भुलाना आसान नहीं होगा ... बस में होता तो आज का दिन कभी ना आने देता पर शायद माँ जानती थी जीवन के सबसे बड़े सत्य का पाठ वही पढ़ा सकती थी ... सच बताना माँ ... क्या इसलिए ही तुम चली गईं ना ...   


ज़िन्दगी की अंजान राहों पर
अब डर लगने लगा है

तुमने ही तो बताया था 
ये कल-युग है द्वापर नहीं  
कृष्ण बस लीलाओं में आते हैं अब
युद्ध के तमाम नियम
दुर्योधन के कहने पर तय होते हैं
देवों के श्राप शक्ति हीन हो चुके हैं
 
मैं अकेला और दूर तक फैली क्रूर नारायणी सेना
हालांकि तेरा सिखाया हर दाव
खून बन के दौड़ता है मेरी रगो में

एक तुम ही तो सारथी थीं
हाथ पकड़ कर ले आईं यहाँ तक
मेरी कृष्ण, मेरी माया
जिसके हाथों सुरक्षित थी मेरी जीवन वल्गा

अकेला तो मैं अब भी हूँ
जिंदगी के ऊबड़-खाबड़ रास्ते भी हैं हर पल 
और मेरा रथ भी वैसे ही दौड़ रहा है

सच बताना माँ

मेरी जीवन वल्गा अब भी तुम्हारे हाथों में ही है न ...?