सोमवार, 22 अगस्त 2016

इंसानियत का झंडा कब से यहाँ खड़ा है ...

बीठें पड़ी हुई हैं, बदरंग हो चुका है
इंसानियत का झंडा, कब से यहाँ खड़ा है

सपने वो ले गए हैं, साँसें भी खींच लेंगे
इस भीड़ में नपुंसक, लोगों का काफिला है

सींचा तुझे लहू से, तू मुझपे हाथ डाले
रखने की पेट में क्या, इतनी बड़ी सजा है

वो काट लें सरों को, मैं चुप रहूँ हमेशा
सन्देश क्या अमन का, मेरे लिए बना है

क्यों खौलता नहीं है, ये खून बाजुओं में
क्या शहर की जवानी, पानी का बुलबुला है

बारूद कर दे इसको, या मुक्त कर दे इससे
ये कैदे बामशक्कत, जो तूने की अता है

(तरही गज़ल ...) 

सोमवार, 15 अगस्त 2016

वेश वाणी भेद तज कर हो तिरंगा सर्वदा ...

सभी देश वासियों को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं ...

लक्ष्य पर दृष्टि अटल अंतस हठीला चाहिए
शेष हो साहस सतत यह पथ लचीला चाहिए

हों भला अवरोध चाहे राह में बाधाएं हों
आत्मा एकाग्र चिंतन तन गठीला चाहिए

मुक्त पंछी, मुक्त मन, हों मुक्त आशाएं सभी
मुक्त हो धरती पवन आकाश नीला चाहिए

पीत सरसों, पीत चन्दन, खिल उठे सूरजमुखी
लहलहाता खेत हो परिधान पीला चाहिए

प्रेम निश्छल नैन पुलकित संतुलित सा आचरण
स्वप्न सत-रंगी सरल यौवन सजीला चाहिए

वेश वाणी भेद तज कर हो तिरंगा सर्वदा
चिर विजय की कामना हो कृष्ण लीला चाहिए  

गुरुवार, 11 अगस्त 2016

मेरी चाहत है बचपन की सभी गलियों से मिलने की ...

कभी गोदी में छुपने की कभी घुटनों पे चलने की
मेरी चाहत है बचपन की सभी गलियों से मिलने की

सजाने को किसी की मांग में बस प्रेम काफी है
जरूरी तो नहीं सूरज के रंगों को पिघलने की

कहाँ कोई किसी का उम्र भर फिर साथ देता है
ज़रुरत है हमें तन्हाइयों से खुद निकलने की

वहां धरती का सीना चीर के सूरज निकलता है
जहां उम्मीद रहती है अँधेरी रात ढलने की

बड़ी मुश्किल से मिलती है किसी को प्रेम की हाला
मिली है गर नसीबों से जरूरत क्या संभलने की

उसे मिलना था खुद से खुद के अन्दर ही नहीं झाँका
खड़ा है मोड़ पे कबसे किसी शीशे से मिलने की  

सोमवार, 1 अगस्त 2016

मगर तकसीम हिंदुस्तान होगा ...

जहाँ बिकता हुआ ईमान होगा
बगल में ही खड़ा इंसान होगा

हमें मतलब है अपने आप से ही
जो होगा गैर का नुक्सान होगा

दरिंदों की अगर सत्ता रहेगी
शहर होगा मगर शमशान होगा

दबी सी सुगबुगाहट हो रही है
दीवारों में किसी का कान होगा

बड़ों के पाँव छूता है अभी तक
मेरी तहजीब की पहचान होगा

लड़ाई नाम पे मजहब के होगी
मगर तकसीम हिंदुस्तान होगा

सोमवार, 25 जुलाई 2016

कह के जो कभी बात को झुठलाएँगे नहीं ...

टूटेंगे मगर फिर भी वो पछताएँगे नहीं
कह के जो कभी बात को झुठलाएँगे नहीं

रिश्तों का यही सच है इसे गाँठ बाँध लो
जो प्रेम से सींचोगे तो मुरझाएँगे नहीं

मुद्दत से धड़कता था ये दिल उन के वास्ते
उम्मीद यही है के वो ठुकराएँगे नहीं

उनके ही हो ये बात कभी दिल से बोल दो
दो नैन कभी आपसे शरमाएँगे नहीं

भाषा जो कभी प्रेम की तुम पढ़ सको पढ़ो
खुद से तो कभी प्रेम वो जतलाएँगे नहीं

जो दर्द का व्योपार ज़माने से कर रहे
ज़ख्मों को कभी आपके सहलाएँगे नहीं


सोमवार, 18 जुलाई 2016

ख़ुशी के साथ थोड़ा गम मिला है ...

कहाँ फिर एक सा मौसम मिला है
ख़ुशी के साथ थोड़ा गम मिला है

किसी दहलीज़ से जाता भी कैसे
तेरी चौखट से बस मरहम मिला है

कहीं से आ गया था ज़िक्र तेरा
मुझे हर शख्स चश्मे-नम मिला है

मुझे शिकवा है तेरा साथ जाना
मिला बे-इन्तहा पर कम मिला है

मेरा बनकर ही मुझको लूटता है
गज़ब मुझको मेरा हमदम मिला है

अकेला ही चला जो जिंदगी में
कहाँ उसका दिया मद्धम मिला है

मंगलवार, 12 जुलाई 2016

गुज़र गए जो पल वो लौट कर नहीं मिलते ...

हजार ढूंढ लो वो उम्र भर नहीं मिलते
उजड़ गए जो आँधियों में घर नहीं मिलते

नसीब हो तो उम्र भर का साथ मिलता है
किसी के ढूँढने से हम-सफ़र नहीं मिलते

जो दुःख में सुख में साथ थे गले लगाने को
यहाँ वहां कहीं भी वो शजर नहीं मिलते

उड़ान होंसले से भर सको तो उड़ जाना
घरों में बंद पंछियों को पर नहीं मिलते

जो जी सको तो जी लो जिंदगी का हर लम्हा
गुज़र गए जो पल वो लौट कर नहीं मिलते

मंगलवार, 5 जुलाई 2016

मंच पर आने से पहले बे-सुरा हो जाएगा ...

जी हजूरी कर सको तो सब हरा हो जाएगा
सच अगर बोला तो तीखा सा छुरा हो जाएगा

चल पड़ा हूँ मैं अँधेरी रात में थामें जिगर
एक जुगनू भी दिखा तो आसरा हो जाएगा

ये मेरी किस्मत है या मुझको हुनर आता नहीं
ठीक करने जब चला मैं कुछ बुरा हो जाएगा

इम्तिहानों की झड़ी ऐसी लगाई आपने
प्रेम में तपते हुए आशिक खरा हो जाएगा

या करो इकरार या फिर मार डालो इश्क में
तीर से नज़रों के आशिक अधमरा हो जाएगा

सीख ना पाए अगर तो शब्द लय सुर ताल छंद
 मंच पर आने से पहले बे-सुरा हो जाएगा

सोमवार, 27 जून 2016

ब्लॉग पे लगता है जैसे शायरी सोई हुई ...

कुदरती एहसास है या जिंदगी सोई हुई
बर्फ की चादर लपेटे इक नदी सोई हुई

कुछ ही पल में फूल बन कर खिल-खिलाएगी यहाँ
कुनमुनाती धूप में कच्ची कली सोई हुई

रात भर आँगन में पहरा जान कर देता रहा
मोंगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई

थाल पूजा का लिए तुम आ रही हो दूर से
आसमानी शाल ओढ़े जागती सोई हुई

यूँ भी देखा है कभी इस प्रेम के संसार में
जागता प्रेमी मिला और प्रेयसी सोई हुई

फेस-बुक के शोर में सब इस कदर मसरूफ हैं
ब्लॉग पे लगता है जैसे शायरी सोई हुई

कुछ कटे से हाथ, कुछ साँसें, सुलगती सिसकियाँ
संगे-मरमर ओढ़ कर मुमताज़ थी सोई हुई
(तरही ग़ज़ल)

सोमवार, 20 जून 2016

जिसे अपना नहीं बस दूसरों का दर्द होगा ...

किसी उजड़े हुए दिल का गुबारो-गर्द होगा
सुना है आज मौसम वादियों में सर्द होगा

मेरी आँखों में जो सपना सुनहरी दे गया है
गुज़रते वक़्त का कोई मेरा हमदर्द होगा

बहा कर जो पसीना खेत में सोना उगा दे
हज़ारों में यकीनन एक ही वो मर्द होगा

कहाँ है तोड़ने का दम किसी की बाज़ुओं में
गिरा जो शाख से पत्ता यकीनन ज़र्द होगा

कहाँ मिलते हैं ऐसे लोग दौरे-जिंदगी में
जिसे अपना नहीं बस दूसरों का दर्द होगा