सोमवार, 19 जून 2017

कैसे कह दूं ...

सुलगते ख्वाब ... कुनमुनाती धूप में लहराता आँचल ... तल की गहराइयों में हिलोरें लेती प्रेम की सरगम ... सतरंगी मौसम के साथ साँसों में घुलती मोंगरे की गंध ... क्या यही सब प्रेम के गहरे रिश्ते की पहचान है ... या इनसे भी कुछ इतर ... कोई जंगली गुलाब ...

झर गई दीवारें
खिड़की दरवाजों के किस्से हवा हुए
मिट्टी मिट्टी आंगन धूल में तब्दील हो गया
पर अभी सूखा नहीं कोने में लगा बबूल
कैसे मान लूं की रिश्ता टूट गया

अनगिनत यादों के काफिले गुज़र गए इन ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर
जाने कब छिल गयी घर जाने वाली सड़क की बजरी
पर बाकी है, धूल उड़ाती पगडण्डी अभी
कैसे मान लूं की रिश्ता टूट गया

कुछ मरे हुवे लम्हों की रखवाली में 
मेरे नाम लिखा टूटा पत्थर भी ले रहा है सांसें  
कैसे मान लूं की रिश्ता टूट गया

कई दिनों बाद इधर से गुज़रते हुए सोच रहा हूँ    
हिसाब कर लूं वक़्त के साथ
जाने कब वक़्त छोड़ जाए, वक़्त का साथ

फिर उस जंगली गुलाब को भी तो साथ लेना है 
खिल रहा है जो मेरी इंतज़ार में ... 

मंगलवार, 6 जून 2017

तितर बितर लम्हे ...

समय की पगडण्डी पे उगी मुसलसल यादें, इक्का दुक्का क़दमों के निशान ... न खत्म होने वाला सफ़र और गुफ्तगू तनहाई से ... ये लम्हे कभी गोखरू, कभी फूल ... तो कभी चुभता हुआ दंश, जंगली गुलाब का ...    

मेहनत की मुंडेर पे पड़ा होता है
कामयाबी का एक टुकड़ा
जरूरी है नसीब का होना
सौ मीटर की इस रेस को जीतने के लिए  
या फिर ...
तेरे जूडे में जंगली गुलाब लगाने के लिए
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चल तो लेता है हर कोई
पर सकून भरी रहगुज़र नहीं मिलती
सफर से लंबा यादों का बोझ
ओर यादों की पोटली में ताज़ा जंगली गुलाब
शायद शुरू हो नया रास्ता
उम्र के आखरी चौराहे से
xxx
घर के दरवाजे पर छोड़ देता हूं दफ्तर का भारीपन  
की काफी है पत्नी के कन्धों पर
गृहस्थी ओर बच्चों के बस्ते का बोझ
xxx
आखरी पढाव पे टिके रहना संभव नहीं होता     
बर्फ की तरह हथेली से पिघल जाती है कामयाबी 
पहली लहर के साथ निकल जाती है समुन्दर की रेत

नसीब फिर जरूरी हो जाता है कोसने के लिए 

सोमवार, 29 मई 2017

यादें ... जंगली गुलाब की ...

धाड़ धाड़ चोट मारते लम्हे ... सर फट भी जाये तो क्या निकलेगा ... यादों का मवाद ... जंगली गुलाब का कीचड़  ... समय की टिकटिक एक दुसरे से जुड़ी क्यों है ... एक पल, यादों के ढेर दूसरे पल को सौंपे, इससे पहले सन्नाटे का पल क्यों नहीं आता ...

फंस के रह गया है ऊँगली से उधड़ा सिरा
जंगली गुलाब के काँटों में 
तुझसे दूर जाने की कोशिश में
खिंच रही है उम्र धागा धागा

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जैसे बची रहती है आंसू की बूँद पलकों के पीछे
खुशी का आखरी लम्हा भी छुपा लिया

आसमानी चुन्नी का अटकना तो याद है ...
जंगली गुलाब की चुभन
रह रह के उठती है उस रोज से

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मुसलसल चलने का दावा
पर कौन चल सका अब तक फुरसत के चार कदम

धूल उड़ाते पाँव
गुबार के पीछे जागता शहर
पेड़ों के इर्द-गिर्द बिखरे यादों के लम्हे

मुसाफिर तो कब के चले गए
खिल रहा है जंगली गुलाब का झाड़
किसी के इन्तार में  

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कुछ मुरीदों के ढेर, मन्नतों के धागे ...
दुआ में उठते हाथों के बीच
मुहब्बत की कब्र से उठता जंगली गुलाब की अगरबत्ती का धुंवा 

इस खुशबू की हद मेरे प्रेम जितनी तो होगी ना ...?

मंगलवार, 23 मई 2017

वजह ... बे-वजह जिंदगी की ...

सम्मोहन, बदहवासी ... पर किस बात की ... जैसे कुछ पकड़ में नहीं आ रहा ... चेहरे ही चेहरे या सारे मेरे चेहरे ...  फिसल रही हो तुम या मैं या जिंदगी या कुछ और ... सतह कहाँ है ...

बेवजह बातें के लिए 
लंबी रात का होना जरूरी नहीं

मौन का संवाद कभी बेवजह नहीं होता
हालांकि रात
कई कई दिन लंबी हो जाती है

उनको देखा
देखते ही रह गया
इसलिए तो प्यार नहीं होता

प्यार की वजह खोजने में
उम्र कम पड़ जाती है
कुछ समय बाद करने से ज्यादा
वजह जानना जरूरी होने लगता है

हालांकि मुसलसल कुछ नहीं होता
जिंदगी के अंधेरे कूँवे में फिसलते लोगों के सिवा     

नज़र नहीं आ रही पर ज़मीन मिलेगी पैरों को
अगर इस कशमकश में बचे रहे

फिसलन के इस लंबे सफर में
जानी पहचानी बदहवास शक्लें देख कर
मुस्कुराने को जी चाहता है

कितना मिलती जुलती हैं मेरी तस्वीर से ये शक्लें  
ऐसा तो नहीं आइना टूट के बिखरा हो  

सोमवार, 8 मई 2017

संघर्ष सपनों का ... या जिंदगी का

पहली सांस का संघर्ष शायद जीवन का सबसे बड़ा संघर्ष है ... हालांकि उसके बाद भी जीवन का हर पल किसी सग्राम से कम नहीं ... साँसों की गिनती से नहीं ख़त्म होती उम्र ... उम्र ख़त्म होती है सपने देखना बंद करने से ... सपनों की खातिर लड़ने की चाह ख़त्म होने से ...  

मौसम बदला पत्ते टूटे
कहते हैं पतझड़ का मौसम है चला जायगा

सुबह हुई सपने टूटे
पर रह जाती हैं यादें पूरी उम्र के लिए
क्या आसान होगा
अगली नींद तक सपनों को पूरा करना
और ... जी भी लेना

हकीकत की ऊबड़-खाबड़ ज़मीन
खेती लायक नहीं होती 
दूसरों के हाथों से छीनने होते हैं लम्हें   

जागना होता है पूरी रात
सपनों के टूटने के डर से नहीं 
इस डर से ...
की छीन न लिए जाएँ सपने आँखों से

इसलिए जब तक साँसें हैं पूरा करो
सपनों को भरपूर जियो

जिंदगी के सबसे हसीन सपने
कहाँ आते हैं दुबारा ... टूट जाने के बाद  

सोमवार, 1 मई 2017

मजदूर सच में ... या मजदूर दिवस ...

नीव का पहला पत्थर पर कितना ज़रूरी ... क्यों नहीं होता उसका नाम ... निर्माण का सतत साक्षी होने के बावजूद भी वो नहीं होता कहीं ... वर्ग जो दब के रह जाता है अपने सृजन के सौंदर्य में ...     

लहू सिंचित हाथों से
प्रखर तीरों का निर्माण करने वाले

इतिहास की छाती पे
क्रान्ति गान लिखने वाले 

सागर की उश्रंखल लहरों से
परिवर्तन की धार निकालने वाले

कुछ सिरफिरे पागलों के निशान
इतिहास में नहीं मिलते
काल खंड की गणना में उनका नाम नहीं होता
लोक गीतों की बोलियां
उनके साहस से नहीं गूंजती  

हां उनके पसीने की गंध उठती है
मिट्टी की सोंधी महक बन कर
झलकता है उनका अदृश्य सौन्दर्य
सृजन के आभा-मंडल में 

आसमां में चमकते कुछ तारे बदलते रहते हैं अपनी दिशा
जबकि निर्माण की सतत प्रक्रिया के साक्षी होते हैं वो   

और हाँ ... उन तारों का भी कोई नाम नहीं होता 
जैसे मजदूर ...

सोमवार, 24 अप्रैल 2017

जिंदगी किताब और आखरी पन्ना ...

क्या सच में जीवन का अन्त नहीं ... क्या जीवन निरंतर है ... आत्मा के दृष्टिकोण से देखो तो शायद हाँ ... पर शरीर के माध्यम से देखो तो ... पर क्या दोनों का अस्तित्व है एक दुसरे के बिना ... छोड़ो गुणी जनों के समझ की बाते हैं अपने को क्या ...   

अचानक नहीं आता
ज़िंदगी की क़िताब का आखरी पन्ना
हां ... कभी कभी
कहानी का अन्त आ जाता है बीच में
कई बार उस अन्त से आगे जाने की इच्छा मर जाती है
पर जीवन चलता रहता है
थके हुए कछुए की रफ़्तार से

कहते हैं लकड़ी पे लगी दीमक
जितना जल्दी हो निकाल देनी चाहिए
और सच पूछो तो यादें भी
नहीं तो झड़ती हैं बुरादे की तरह साँसें ज़िन्दगी से   

अच्छा होता जो खाली रहती ज़िंदगी की किताब
कोरी ... श्वेत धवल अन्त तक

कम से कम आखरी पन्ने की तलाश 
आखरी पन्ने पे ख़त्म होती ...

सोमवार, 17 अप्रैल 2017

ख़ामोशी ... एक एहसास

क्या बोलते रहना ही संवाद है ... शब्द ही एकमात्र माध्यम है अपनी बात को दुसरे तक पहुंचाने का ... तो क्या शब्द की उत्पत्ति मनुष्य के साथ से ही है ... अगर हाँ तो फिर ख़ामोशी ...

ख़ामोशी टुकड़ा नहीं
मुंह में डाला स्वाद ले लिया

ख़ामोशी पान भी नही चबाते रहे अंदर अंदर
जब चाहा थूक दिया कोरी दीवार पर
अपने होने का एहसास दिखाने के लिए

लड़ते रहना होता है अपने आप से निरंतर  
दबानी पड़ती है दिल की कशमकश
रोकना होता है आँखों का आइना
बोलता रहता है जो निरंतर
तब कहीं जा कर ख़ामोशी बनाती है अपनी जगह  
पाती है नया आकार
बन पाती है खुद अपनी ज़ुबान  

हाँ ... तब ही पहुँच पाती है अपने मुकाम पर
जहाँ दो इंच का फांसला तय करने में गुज़र जाए पूरी उम्र  

ख़ामोशी चीख है सन्नाटे में
जो आती है दबे पाँव कर जाती है बहरा हमेशा के लिए  

ख़ामोशी सच में कोई टुकड़ा नहीं ...

सोमवार, 10 अप्रैल 2017

कड़वा सच ...

बिन बोले, बिन कहे भी कितना कुछ कहा जा सकता है ... पर जैसा कहा क्या दूसरा वैसा ही समझता है ... क्या सच के पीछे छुपा सच समझ आता है ... शायद हाँ, शायद ना ... या शायद समझ तो आता है पर समय निकल जाने के बाद ...   

एक टक हाथ देखने के बाद तुमने कहा 
राजा बनोगे या बिखारी

वजह पूछी
तो गहरी उदासी के साथ चुप हो गईं
और मैंने ...
मैंने देखा तुम्हारी आँखों में 
ओर जुट गया सपने बुनने

भूल गया की लकीरों की जगह
हाथों का कठोर होना ज्यादा ज़रुरी है
सपनों के संसार से परे
एक हकीकत की दुनिया भी होती है
जहाँ लकीरें नहीं पत्थर की खुरदरी ज़मीन होती है

जूते पहनने के काबिल होने तक
नंगे पाँव चलना ज़रूरी होता है
गुलाब की चाह काँटों से उलझे बिना परवान नहीं चढ़ती  

ये सच है की सपनों का राजकुमार
मैं कभी का बन गया था
आसान जो था
नज़रें बंद करके सोचना भर था
पर भिखारी बने बिना भी न रह सका
(तुम्हारी तलाश में ठोकरें जो खाता रहता हूं)

सच है ... हाथ की रेखाएं बोलती हैं  ...

सोमवार, 3 अप्रैल 2017

चाहत उम्मीद की ...

सोचता हूँ फज़ूल है उम्मीद की चाह रखना ... कई बार गहरा दर्द दे जाती हैं ... टुकड़ा टुकड़ा मौत से अच्छा है  खुदकशी कर लेना ...

कुछ आहटें आती है उम्मीद की उस रास्ते से
छोड़ आए थे सपनों के सतरंगी ढेर जहां   
आशाओं के रेशमी पाँव रहने दो पालने में
की ज़मीन नहीं मिल पायगी तुम्हारी दहलीज़ की 
लटके रहेंगे हवा में
लटका रहता है खुले आसमान तले जैसे चाँद  

मत देना सांस उम्मीद को  
छोटी पड़ जाती है उम्र की पगडण्डी   
ओर बंद नहीं होता डाली पे फूल खिलना 
फज़ूल जाती हैं पतझड़ की तमाम कोशिशें
बारहा लहलहाते हैं उम्मीद के पत्ते

छुपा लेना उंगली का वो सिरा
झिलमिलाती है जहां से बर्क उम्मीद की   
आँखें पी लेती हैं तरंगें शराब की तरह  
नशा है जो उम्र भर नहीं उतरता

मत छोड़ना नमी जलती आग के गिर्द
भाप बनने से पहले ले लेते हैं पनाह उम्मीद के लपकते शोले
मजबूत होती रहती हैं जड़ें उम्मीद की  

हालांकि खोद डाली है गहरी खाई उस रास्ते के इस ओर मैंने
जहां से होकर आता है लाव-लश्कर उम्मीद का
पर क्या करूं इस दिल का  
जो छोड़ना नहीं चाहता दामन उम्मीद का ...