सोमवार, 11 फ़रवरी 2019

झपकियों ही झपकियों में रात कब की हो गई ...

इस नज़र से उस नज़र की बात लम्बी हो गई
मेज़ पे रक्खी हुई ये चाय ठंडी हो गई

आसमानी शाल ने जब उड़ के सूरज को ढका
गर्मियों की दो-पहर भी कुछ उनींदी हो गई

कुछ अधूरे लफ्ज़ टूटे और भटके राह में     
अधलिखे ख़त की कहानी और गहरी हो गई

रात के तूफ़ान से हम डर गए थे इस कदर
दिन सलीके से उगा दिल को तसल्ली हो गई

माह दो हफ्ते निरंतर, हाज़री देता रहा
पन्द्रहवें दिन आसमाँ से यूँ ही कुट्टी हो गई

कुछ दिनों का बोल कर अरसा हुआ लौटीं न तुम 
इश्क की मंडी में जानाँ तबसे मंदी हो गई

बादलों की बर्फबारी ने पहाड़ों पर लिखा   
रात जब सो कर उठी शहरों में सर्दी हो गई

कान दरवाज़े की कुंडी में ही अटके रह गए
झपकियों ही झपकियों में रात कब की हो गई

सोमवार, 4 फ़रवरी 2019

हया किसी के निगाहों का कह रही सच है ...


यही ज़मीन, यही आसमां, यही सच है 
यहीं है स्वर्ग, यहीं नर्क, ज़िन्दगी सच है

हसीन शाम के बादल का सुरमई मंज़र 
हथेलियों पे सजी रात की कली सच है

उदास रात की स्याही से मत लिखो नगमें  
प्रभात की जो मधुर रागिनी वही सच है  

ये तू है, मैं हूँ, नदी, पत्तियों का यूँ हिलना
ये कायनात, परिंदे, हवा सभी सच है

अभी जो पास है वो एक पल ही है जीवन
किसी के इश्क में डूबी हुई ख़ुशी सच है

कभी है गम तो ख़ुशी, धूप, छाँव, के किस्से
झुकी झुकी सी नज़र सादगी हंसी सच है

नज़र नज़र से मिली एक हो गयीं नज़रें
हया किसी के निगाहों का कह रही सच है

सोमवार, 28 जनवरी 2019

वक़्त ने कुछ अनकही मजबूरियों को रख दिया ...

मखमली से फूल नाज़ुक पत्तियों को रख दिया
शाम होते ही दरीचे पर दियों को रख दिया

लौट के आया तो टूटी चूड़ियों को रख दिया
वक़्त ने कुछ अनकही मजबूरियों को रख दिया

आंसुओं से तर-बतर तकिये रहे चुप देर तक  
सलवटों ने चीखती खामोशियों को रख दिया

छोड़ना था गाँव जब रोज़ी कमाने के लिए
माँ ने बचपन में सुनाई लोरियों को रख दिया 

भीड़ में लोगों की दिन भर हँस के बतियाती रही 
रास्ते पर कब न जाने सिसकियों को रख दिया

इश्क़ के पैगाम के बदले तो कुछ भेजा नहीं
पर मेरी खिड़की पे उसने तितलियों को रख दिया

नाम जब आया मेरा तो फेर लीं नज़रें मगर
भीगती गजलों में मेरी शोखियों को रख दिया

चिलचिलाती धूप में तपने लगी जब छत मेरी
उनके हाथों की लिखी कुछ चिट्ठियों को रख दिया 

कुछ दिनों को काम से बाहर गया था शह्र के
पूड़ियों के साथ उसने हिचकियों को रख दिया

कुछ ज़ियादा कह दिया, वो चुप रही पर लंच में
साथ में सौरी के मेरी गलतियों को रख दिया

बीच ही दंगों के लौटी ज़िन्दगी ढर्रे पे फिर
शह्र में जो फौज की कुछ टुकड़ियों को रख दिया

कुछ दलों ने राजनीती की दुकानों के लिए
वोट की शतरंज पे फिर फौजियों को रख दिया

सोमवार, 21 जनवरी 2019

न्याय-व्यवस्था ...


कौन हूँ मैं
आँखों में पट्टी लपेटे
दूर तक गहरा देखने की क्षमता से विकसित
श्वेत धवल पाषाण काया में  
सत्य की तराजू थामे
झूठ के ग्रुत्वाकर्षण से मुक्त
स्थित्प्रग्य, संवेदना से परे 
गरिमामय वैभवशाली व्यक्तित्व लिए

याद आया कौन हूँ ... ?

सुना है कभी दुधारी तलवार हुवा करती थी
चलती थी इतना महीन कि पद-चाप सुनाई दे
सूर्य का तेज, तूफ़ान की गति
थम जाती थी मेरे सम्मोहन से सब की मति

क्या .... अभी भी नहीं समझे?

समझोगे कैसे ...
मैं कुंद, जंग लगी तलवार हूँ  
तार तार पट्टी से लाज बचाती   
अपने ही परिहास का बोझा उठाए
अंधी, बेबस, लाचार हूँ
बंद रहती हूँ अमीरो की रत्न-जड़ित तिजोरी में
क़ानून की लम्बी बहस में अटकी व्यवस्था की चार-दिवारी में
गरीबी की लाचारी में, महाजन की उधारी में
न्याय की ठेकेदारी में, वकीलों की पेशेदारी में  

शाहबानों के किस्सों में, निर्भया के हिस्सों मैं  
दंगों की आफत में, घोटालों की विरासत में

सुना है बूढ़ी होते आँखें के सपने, जवानी की आशा   
ताक रहे हैं मेरा तराज़ू  

कानून की धाराओं में जकड़ी 
चीख रही है आत्मा मेरी

क़ानून की किसी धारा में खोजो
न हो तो तलवार से भेदो
मेरे गौरव-शाली इतिहास को आधार दो

मुझ न्याय को न्याय से जीने का अधिकार दो

मंगलवार, 15 जनवरी 2019

सिरा सुख दुःख का ...


दुःख नहीं होगा तो क्या जी सकेंगे ...

खिलती हुई धूप के दुबारा आने की उमंग
स्याह रात को दिन के लील लेने के बाद जागती है

सर्दी के इंतज़ार में देवदार के ठूंठ न सूखें
तो बर्फ की सफ़ेद चादर तले प्रेम के अंकुर नहीं फूटते

काले बादल के ढेर कड़कते हुए न गरजें
तो बेमानी सावन बरसते हुए भी भिगो नहीं पाता

मिलन के ठीक एक लम्हा पहले बिछड़ने की याद
बे-मौसम खिला देती हैं फूल
पंछी भी गाने लगते हैं गीत

सच बताना क्या सुख का एहसास दुःख से नहीं ...
सुख का एक सिरा दुःख का दूसरा सिरा नहीं ...?

सोमवार, 7 जनवरी 2019

लम्हे इश्क के ...


एक दो तीन ... कितनी बार 
फूंक मार कर मुट्ठी से बाल उड़ाने की नाकाम कोशिश
आस पास हँसते मासूम चेहरे
सकपका जाता हूँ
चोरी पकड़ी गयी हो जैसे  
जान गए तुम्हारा नाम सब अनजाने ही

कितना मुश्किल हैं न खुद से नज़रें चुराना
इश्क से नज़रें चुराना

इंसान जब इश्क हो जाता है
उतरना चाहता है किसी दिल में
और अगर वो दिल उसके महबूब का हो
मिल जाता है उसे मुकाम

तेरी नर्म हथेली में हथेली डाले
गुज़ार सकता हूँ तमाम उम्र फुदकती गिलहरी जैसे

तेरे साथ गुज़ारा दुःख भी इश्वर है
पाक पवित्र तेरे आँचल जैसा
तभी तो उसकी यादों में जीने का दिल करता है 
प्रेम भी कितनी कुत्ती शै है

मंगलवार, 1 जनवरी 2019

नव वर्ष ...

ब्लॉग जगत के सभी साथियों को नव वर्ष की मंगल कामनाएं ... सन २०१९ नई उम्मीद, और सार्थक सोच ले के आए, भारत देश में सुख शान्ति का प्रवाह निरंतर बना रहे ... आज के दिन एक प्रश्न स्वयं से ...

क्या नया नव वर्ष में हमको मिला
हूबहू कल सा ही दिन था जो खिला

भोर बोझिल बदहवास सी मिली
धूप जैसी कल थी वैसी ही मिली
रात का आँचल भी तक़रीबन वही
पर नयी तारीख़ सबको थी मिली
सोचता हूँ क्यों रखूँ कोई गिला ... ?
क्या नया नव वर्ष में हमको मिला

इस तरफ़ तारीख़ बदली उस तरफ़
ज़िंदगी का एक दिन कम हो गया
कौन सी ख़ुशियाँ समय ने बाँट दीं
शोर जो इतना सुबह से हो गया
क्या नया सूरज कहीं फिर से जला ... ?
क्या नया नव वर्ष है हमको मिला

भूख कल सी, प्यास भी घटती नहीं
कश्म-कश जद्दो-जहद रुकती नहीं
तन पे कपड़ा क्या सभी को मिल गया
पेट की ये आग क्यों बुझती नहीं
रोटियों का ढेर क्या सबको मिला ... ? 
क्या नया नव वर्ष में हमको मिला

सोमवार, 24 दिसंबर 2018

सुन युधिष्ठर फैंक दे अपने ये पासे


प्रेम के सब गीत अब लगते हैं बासे
दूर जब से हो गया हूँ प्रियतमा से

मुड़ के देखा तो है मुमकिन रोक ना लें 
नम सी आँखें और कुछ चेहरे उदासे

नाम क्या दोगे हमारी प्यास का तुम
पी लिया सागर रहे प्यासे के प्यासे

आ रहे हैं खोल के रखना हथेली
टूटते तारे भी दे देते हैं झांसे

उम्र भर थामे रहे सच का ही दामन   
और पीछे रह गए हम अच्छे ख़ासे

फूट जाएगा तो सागर लील लेगा 
दिल का मैं साझा करू अब दर्द कासे 

हर गली मिल जाएँगे कितने ही शकुनी 
सुन युधिष्ठर फैंक दे अपने ये पासे 

सोमवार, 17 दिसंबर 2018

यूँ तो हर मंदिर में बस पत्थर मिलेगा ...


खेत, पीपल, घर, कुआँ, पोखर मिलेगा
क्यों है ये उम्मीद वो मंज़र मिलेगा

तुम गले लगना तो बख्तर-बंद पहने
दोस्तों के पास भी खंज़र मिलेंगा

कूदना तैयार हो जो सौ प्रतीशत
भूल जाना की नया अवसर मिलेगा

इस शहर में ढूंढना मुमकिन नहीं है
चैन से सोने को इक बिस्तर मिलेगा

देर तक चाहे शिखर के बीच रह लो
चैन धरती पर तुम्हे आकर मिलेगा

बैठ कर देखो बुजुर्गों के सिरहाने
उम्र का अनुभव वहीं अकसर मिलेगा

मन से मानोगे तो खुद झुक जाएगा सर 
यूँ तो हर मंदिर में बस पत्थर मिलेगा