गुरुवार, 11 सितंबर 2008

अच्छा लगेगा

शहर दरिया हो या हो सहरा पहाड़
साथ दो तुम उम्र भर अच्छा लगेगा

थक चुका हूँ जिन्दगी की धूप में
छावं में तेरी मगर अच्छा लगेगा

सर्दियों का वक़्त और कुल्लू का मौसम
हो गयी है दोपहर अच्छा लगेगा

रेत का दरिया और हम तुम साथ हैं
ख़त्म न हो ये सफर अच्छा लगेगा

चाँद में धब्बे सहे नही जाते
आप जेसे भी हो पर अच्छा लगेगा

दिल ही रखने को सही पर बोल दो
याद आया दिगम्बर अच्छा लगेगा

रात होने को है और तन्हा हूँ में
लौट आओ मेरे घर अच्छा लगेगा