गुरुवार, 2 अक्तूबर 2008

रौशनी का लाल गोला खो गया है सहर से

बच गए थे चंद लम्हे ज़िंदग़ी के कहर से
साँस अब लेने लगे हैं वो तुम्हारे हुनर से

लोग कहते हैं तुम्हारी बात से झड़ते हैं फूल
रीता हुआ आँगन हूँ मैं गुज़रो कभी तो इधर से

बारिशों का कारवाँ रुकता नही है आँख से
दर्द का बादल कोई गुज़रा है मेरे शहर से

समय की पगडंडियों मैं स्वप्न बिखरे हैं मेरे
पाँव में कंकड़ चुभेंगे तुम चलोगे जिधर से

तमाम उम्र तुम महसूस करोगे मेरे अहसास को
तुम तो बस इक बीज हो मेरे उगाये शजर से

इक जमाना हो गया दीपक जलाये बैठा हूँ
कभी तो गुज़रोगे तुम मेरी राहे गुज़र से

तमाम उम्र तेरी आँख में बैठा रहूँगा
ख़्वाब देखोगे तुम सिर्फ़ मेरी नज़र से

जुगनुओं की मांग सारे शहर से है आ रही
क्या रौशनी का लाल गोला खो गया है सहर से?