शनिवार, 11 अक्तूबर 2008

अन्तिम सफर तो सब करते

आ लौट चलें बचपन में
क्या रख्खा जीवन में

दो सांसों का खेल है वरना
पञ्च तत्त्व इस तन में

लोरी कंचे लट्टू गुड़िया
कौन धड़कता मन में

धीरे धीरे रात का आँचल
उतर गया आँगन में

तेरे बोल घड़ी की टिक टिक
धड़कन धड़कन में

बरखा तो आई फ़िर भी
क्यों प्यासे सावन में

रोयेंगे चुपके चुपके
ज़ख्म रिसेंगे तन में

यूँ तो सब संगी साथी
कौन बसा जीवन में

तेरा मेरा सबका जीवन
सांसों के बंधन में

वो तो मौत झटक के आया
मरा तेरे आँगन में

मेरे सपने चुभेंगे तुमको
खेलो न मधुबन में

अन्तिम सफर तो सब करते
मिट्टी या चंदन में