रविवार, 12 अक्तूबर 2008

लुट गए हैं रंग सारी कायनात के

खो गयी है आज क्यों सूरज की धूप
लुट गए हैं रंग सारी कायनात के

जुगनुओं से दोस्ती अब हो गयी अपनी
साथ मुझ को ले चलो ऐ राही रात के

तू छावं भी है धूप भी बरसात भी
रंग हैं कितने तुम्हारी शख्सियात के

छत तेरी आँगन मेरा, रोटी तेरी चूल्हा मेरा
सिलसिले खो गए वो मुलाक़ात के

मेरी तस्वीर मैं क्यों ज़िन्दगी के रंग भरे
झूठे फ़साने बन गए छोटी सी बात के

काँटे भी चुभे फूल का मज़ा भि लिया
दर्द लिए बैठे थे हम तेरी याद के

कुछ नए तारे खिले हैं आसमान पर
जी उठे लम्हे नए ज़ज्बात के

रास्तों ने रख लिया उनका हिसाब
जुल्म मैं सहता रहा ता-उम्र आप के

बाद-ऐ-मुद्दत फूल खिले हैं यहाँ
वो हिन्दू मुसलमान हैं या और ज़ात के

इक दिन मैं तुझको आईना दिखला दूँगा
तोड़ कर दीवारों दर इस हवालात के

लहू तो बस लाल रंग का हि गिरेगा
पत्थर संभालो दोस्तों तुम अपने हाथ के

है सोचने पर भी यहाँ पहरा लगा हुआ
पंछी उड़ाते रह गया मैं ख़यालात के

फ़िर नए इक हादसे का इंतज़ार
पन्ने पलटते रह गया अख़बार के