शनिवार, 18 अक्तूबर 2008

तोड़ लाना चाँद

यूं तो साथ है तमाम लोगों का हजूम
हम सफ़र कोई तो मेरे साथ होना चाहिये


यूं तो गम में दोस्त बहुत होते हैं शरीक
गले लग कर कोई मेरे साथ रोना चाहिये

जुस्तजू, वादे-वफ़ा, अरमान दिल की ख्वाहिशें
घड़ी भर को नींद आ जाए वो कोना चाहिये


इस जहाँ में आब-दाने की नही चिंता मुझे
ओड़नी है आसमां मिट्टी बिछोना चाहिये


नफरतों की फसल बहुत काट ली सबने यहाँ
प्रेम की बाली उगे वो बीज बोना चाहिये


तुम अगर छूने चलो आकाश की बुलंदियाँ
तोड़ लाना चाँद ये मुझको खिलौना चाहिये


कोई नया खेल तुम न खेलना ऐ बादलों
तुम जो बरसो मेरा घर-आँगन भिगोना चाहिये