रविवार, 2 नवंबर 2008

आइनों के शहर का वो शख्स था

तेज़ थी हवा तुम्हारे शहर की
तितलियों का रंग भी उड़ा दिया

बादलों को घर में मैंने दी पनाह
बिजलियों ने घर मेरा जला दिया

बारिशों का खेल भी अजीब था
डूबतों को और भी डुबा दिया




आइनों के शहर का वो शख्स था
सत्य को सफाई से छुपा गया

इक ज्योतिषी हाथ मेरा देख कर
भाग्य की रेखाओं को मिटा गया

कौन सा भंवरा था साथ शहद के
पंखुरी का रंग भी चुरा गया