मंगलवार, 4 नवंबर 2008

आइना

टूट कर बिखरा हुवा था आइना,
धर्म पर निभा रहा था आइना,

खून से लिख्खे हुवे इतिहास को,
आइना दिखला रहा था आइना,

देख कर वो सत्य सह न पायेगा,
सत्य पर दोहरा रहा था आइना,

तुमने काहे देख ली अपनी छवि,
गर्व से इठला रहा था आइना,

पत्थरों ने रची थीं ये साज़िशें,
कांच कांच सा रहा था आइना,

अंधों के घर आईने ही आईने,
ख़ुद पे तरस खा रहा था आइना,

कौन जाने कौन शहर बिकेगा,
सोच कर घबरा रहा था आइना,

मांग सूनी, भरी पर प्रति-बिम्ब मैं,
कोई गज़ब ढा रहा था आइना,

तोड़ कर हर एक टुकड़ा आईने का,
आईने बना रहा था आइना,