गुरुवार, 6 नवंबर 2008

एक ख्वाहिश

जिस्म ज़ख्मों की जीती जागती नुमाइश है
फ़िर भी जीने की दिल मैं दबी दबी ख़्वाहिश है

दर्द पीछा नही छोड़ेगा मौत आने तक
साँस के साथ साथ दर्द की पैदाइश है

टूट कर बिखर जाने के नही कायल हम भी
साँस बाकी है जब तक सुबह की गुंजाईश है

यूँ न मायूस हो कर होंसले का दम तोड़ो
अभी तो ज़िंदगी से गीत की फरमाइश है

कही घायल, कहीं भूखे कहीं पंछी कफ़स में
हर तरफ़ मौत से जीवन की आज़मईश है