बुधवार, 3 दिसंबर 2008

आँगन

बरसों हो गए उस घर को छोड़े जो आज भी छाया रहता है मेरे ज़हन में,पिछले १५ वर्षों में जाने कितने हि घरों मैं रहा हूँ, पर कोई भी 'अपने आँगन" जैसा नही लगता,उसकी याद, उसकी खुशबू, वहां गुज़ारा एक एक लम्हा, आज भी मन को गुदगुदाता है|

यह कविता, बहुत पहले उस आँगन की याद में शुरू हुई, यादें जुड़ती गयीं, कविता बनती गयी,जाने कितने छंद इसमे और जुडेगें, क्यूंकि वो आँगन तो आज भी उतना ही ताज़ा है, जितना कल था|


आँगन में बिखरे रहे, चूड़ी कंचे गीत
आँगन की सोगात ये, आँगन के हैं मीत

आँगन आँगन तितलियाँ, उड़ती उड़ती जाएँ
इक आँगन का हाल ये, दूजे से कह आएँ

बचपन फ़िर योवन गया, जैसे कल कि बात
आँगन तब भी साथ था, आँगन अब भी साथ 

आँगन में रच बस गयी, खट्टी मीठी याद
आँगन सब को पालता, ज्यों अपनी औलाद

तुलसी गमला मध्य में, गोबर लीपा द्वार
शिव के सुंदर रूप में, आँगन एक विचार

सुख दुःख छाया धूप में, आँगन सदा बहार
आँगन में सिमटा हुवा, छोटा सा संसार

कूंवा जोहड़ सब यहाँ, फ़िर भी बाकी प्यास
बाट जोहता पथिक कि, आँगन एक उदास

दुःख सुख छाया धूप में, भटक गया परिवार
मौन तपस्वी सा रहा, आँगन का व्यवहार

इक इक कर सब छोड़ गए, नाते रिश्तेदार
आँगन में खिलता रहा, फ़िर भी सदाबहार

इक कोने में पेड़ है, दूजे में गोशाल
तीजे ठाकुरद्वार है, आँगन के रखवाल

आँगन से बरसात है, आँगन से है धूप
आँगन जैसे मोहिनी, शिव का सुंदर रूप