शनिवार, 6 दिसंबर 2008

ग़ज़ल

फ़िर कोई खण्डहर विराना ढूँढ़ते हो
मुझसे मिलने का बहाना ढूँढ़ते हो

पौंछ डाला शहर का इतिहास सारा
काहे अब पीपल पुराना ढूँढ़ते हो

इस शहर की बस्तियाँ वीरान हैं
तुम शहर में आबो-दाना ढूँढ़ते हो

गौर से क्यों देखते हो आसमां को
दोस्त या गुज़रा ज़माना ढूँढ़ते हो

मैं जड़ों को सींचता हुं, आब हूँ मैं
क्यूँ अब्र में मेरा ठिकाना ढूँढ़ते हो

रात की चादर लपेटे सोई हैं सड़कें
क्यूँ हादसे,किस्सा,फ़साना ढूँढ़ते हो

लहू से लिक्खा है हर अल्फाज़ मैंने
तुम ग़ज़ल का मुस्कुराना ढूँढ़ते हो