रविवार, 4 जनवरी 2009

ज़िन्दगी बनवास है

हवस है कैसी, नही बुझती तुम्हारी प्यास है
अपने हिस्से का समुन्दर, तो तुम्हारे पास है

साँस लेती हैं दीवारें, आंख हैं ये खिड़कियाँ
इस शहर के खंडहरों से, बोलता इतिहास है

लाल है पत्ते यहाँ सब, लाल उगती घास है
सोई हुयी है दास्ताँ, बिखरा हुवा विशवास है

मेरे घर के पास से, गुजरा था तेरा काफिला
घर मेरा उस रोज़ से, खिलता हुवा मधुमास है

मुद्दतों से लौट कर, क्यूँ घर न आए तुम मेरे
यूँ तो रहता हूँ मैं घर, पर ज़िन्दगी बनवास है

तुझसे पहले आ गयी थी, तेरे आने की ख़बर
खिल उठी खेतों मैं सरसों, छा गया उल्लास है