सोमवार, 19 जनवरी 2009

जिंदगी की रेल है

इस ग़ज़ल के पहले २ शेर मैंने १० साल पहले लिखे थे और ये ग़ज़ल मेरे दिल के बहोत करीब है. कुछ और शेर लिख कर मैंने इसे गुरुदेव पंकज जी के सुपुर्द कर दिया. ये ग़ज़ल ठीक होने के बाद आपकी नज़र है.

आदरणीय पंकज जी का बहुत बहुत आभार

उमर की पटरियों पर जिंदगी की रेल है
ये मरना और जीना तो समय का खेल है

नहीं जब तक मेहरबां मौत हम पर तब तलक
हमारी रूह है और जिस्‍म की ये जेल है

रुई का जिस्‍म है मिट जायेगा कुछ देर में
दिये की धड़कनों में जल रहा बस तेल है

रुकेगी सांस जिस पल बंद होंगीं धड़कनें
वही तो आत्‍मा परमात्‍मा का मेल है

तिरा मासूम चे‍हरा जुल्‍फ काली और घनी
के जैसे चांद का संग बादलों के खेल है