सोमवार, 2 फ़रवरी 2009

साँस का बस खेल है जीवन मरन

सूर्य से पहले है जिसका आगमन
स्वयं को पाने का जो करता सृजन

छू वही सकता हैं ऊंचे शिखर को
कर गुज़रने की लगी हो जब लगन

कौन सी बाधाएं रस्ता रोक लेंगी
जल रही हो मुक्ति की दिल में अगन

स्वयं को बाती बना तिल तिल जले
जिंदगी बन जायेगी उसकी हवन

मुक्त कर दो, तोड़ दो बंधन पुनः
किस के रोके रुका है बहता पवन

काल की सीमाओं में बंधा हुवा
साँस का बस खेल है जीवन मरन

सत्य तो बस एक है "इदं न मम"
देह वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी गगन