गुरुवार, 12 फ़रवरी 2009

साए में संगीन के फूले फले

आज से पूरे एक सप्ताह के लिए छुट्टी ले रहा हूँ, दुबई की भागमभाग जिंदगी से दूर वतन की खुशबू के बीच, दिल्ली की सर्दी का आनंद लेने, हो सका तो देहरादून गौतम जी से मुलाक़ात करने ..........

जाते जाते पेश है एक ग़ज़ल, प्रकाश बादल जी के कहे अनुसार मीटर की परवाह किए बगैर, अच्छी बुरी तो आप ही जाने........

अब नही उठते हैं दिल में ज़लज़ले
पस्त हो गए हमारे होंसले

लाल पत्ते, लाल बाली गेहूं की
साए में संगीन के फूले फले

मिल गयी है न्याय की कुर्सी उसे
कर रहा अपने हक़ में फैंसले

थक गया पर साथ चलता रहूँगा
दूर तक जो साथ तू मेरे चले

रात गयी चाँद क्यों छिपता नही
सोच रहा सूरज पीपल तले

याद माँ की आ गयी विदेश में
दफअतन आँख से आंसू ढले

छाछ भी पीते हैं फूंक मार कर
दूध से हैं होठ जिन के जले

जिंदगी भर लौट कर न जाऊँगा
आज मेरा रास्ता बस रोक ले

गोलियों की बात ही समझेगे वो
गोलियों से कर रहे जो फैंसले

रेत की दीवार से ढह जायेंगे
जिस्म जिनके हो गए खोखले