शनिवार, 21 फ़रवरी 2009

जिंदगी का गीत हो वो गीत लाजवाब

दिल्ली और देहरादून में खिलती हुवे सूरज के नीचे नर्म सर्दी में गुजारे कुछ पल, गौतम जी से छोटी सी हसीन सी यादगार मुलाक़ात, समीर जी (उड़नतश्तरी वाले) से फ़ोन पर हुयी बात और भी न जाने कितने खूबसूरत लम्हों को समेटे अपने छोटे से शहर दुबई में वापस आने के बाद, पेश है ये ताज़ा ग़ज़ल गौतम जी के नाम ...........


जानता हूँ रख न पायेगा कभी हिसाब
नाप कर जो रौशनी बांटेगा आफताब

यूँ तो सारे गीत होते खूबसूरत
जिंदगी का गीत हो वो गीत लाजवाब

जिसमें कोई दाग न धब्बे पड़े हों
क्यूँ नही फ़िर ढूंढ लें हम ऐसा माहताब

हमने अपने दर्द को कुछ यूँ छुपाया
ओस की बूंदों में पिघलता रहा अज़ाब

यूँ अंगूठा टेक हूँ, बे इल्म हूँ पर
जिंदगी की स्याही से लिक्खी मेरी किताब

पोथियाँ पढता रहा कुछ मिल पाया
ढाई आखर प्रेम से गुलज़ार मेरा ख्वाब

घर मेरा कुछ यूँ सजा आने से तेरे
रात रानी खिल उठी खिलता रहा गुलाब