मंगलवार, 17 मार्च 2009

माँ का आँचल हो गया

गुरु देव पंकज सुबीर जी की विशेष अनुकम्पा से इस ग़ज़ल में कुछ परिवर्तन किये हैं. जिसने इस ग़ज़ल को पहले पढ़ा है वो अगर इसे दुबारा पढेंगे तो समझ जायेंगे की ये ग़ज़ल बहूत ही सुन्दर हो गयी है. इस ग़ज़ल के दोषों को उन्होंने इतनी बारीकी से मुझे समझाया की आज मुझे लग रहा है मैंने ग़ज़ल लेखन की तरफ एक और कदम बढा लिया.ये बात चरित्रार्थ हो गयी "गुरु बिन गत नहीं"


पावनि गंगा का मीठा जल हलाहल हो गया,
शहर के फैलाव से जंगल भी घायल हो गया,

सो गया फिर चैन से जब लौट कर आया यहाँ,
गांव का पीपल ही जैसे मां का आंचल हो गया,

थी जिसे उम्मीद वापस लौट कर वो आएगा,
रेत पर लिखता था तेरा नाम पागल हो गया,

था कोई लोफर हवा के साथ जो उड़ता रहा,
छत मिली मेरी तो वो सावन का बादल हो गया,

कोयला था मैं, पड़ा भट्टी किनारे बेखबर,
छू गया आँखों से तेरी और काजल हो गया,

ओढ़ कर आकाश धरती को बिछाता है वो बस,
सादगी इतनी की हाय मैं तो कायल हो गया,

थी खड़ी पलकें झुकाए हाथ में थाली लिए,
देखते ही देखते मन और श्यामल हो गया,