शुक्रवार, 3 अप्रैल 2009

क्‍यों नहीं

गुरु देव पंकज सुबीर जी के आशीर्वाद से तैयार ग़ज़ल......प्रस्तुत है आप सब के सामने

ठंडक का चांदनी में है एहसास क्‍यों नहीं,
सूरज में भी तपिश का है आभास क्‍यों नहीं,

गूंगे हैं शब्‍द, मौन है छन्‍दों की रागिनी,
हैं गीत भी मगर कोइ विन्‍यास क्‍यों नहीं,

जब साथ में जीवन सखी भी तेरे है वो फिर,
चहूं ओर महकता हुआ मधुमास क्‍यों नहीं,

अगनित यहां वो अग्नि परीक्षाएं दे चुकी,
सीता का खत्‍म हो रहा वनवास क्‍यों नहीं,

बचपन को गिरवी रख के समय की दुकान पर,
तुम पूछते हो शहर में उल्‍लास क्‍यों नहीं,

पशु पक्षी, पेड़ पौधे सभी पूछते हैं ये,
इस आदमी की बुझ रही है प्‍यास क्‍यों नहीं,

पत्‍थर के देवता ने कहा आदमी से ये,
तुझको है धर्म पे भला विश्‍वास क्‍यों नहीं,