रविवार, 3 मई 2009

कुछ लम्हे...........

१)

जब शब्द गूंगे हो जाएँ
नज़र कुछ बोल न सके
यादों के दरख्त से टूटे लम्हे
वक़्त के साथ ठहर जाएँ
तुम चुपके से मुस्कुरा देना
हवा चल पड़ेगी.....

२)

जब सांझ की लाली
मेरे आँगन में उतर आएगी
वक़्त कुछ पल के लिए
ठिठक जायेगा
तुम्हें जब शाम की सिन्दूरी
छू रही होगी
मैं इक टीका चुरा लूँगा
तेरे सुर्ख होठों से.....

३)

सुबह रात का किवाड़
खटखटाती है
तारों की छाँव में बैठे चांदनी
मुस्कुराती है
ऐ रात की स्याही
कुछ देर ठहर जाना
आज उनसे पहली मुलाक़ात है
कहीं सपना टूट न जाए.....