गुरुवार, 28 मई 2009

इक नज़्म की इब्तदा

१)

सूखे पत्तों से उठती सिसकियाँ,
मसले हुवे फूलूँ से रिसता दर्द,
बादलों का सीना चीर कर बरसते आंसू,
आज भारी है कुछ मौसम का मिजाज़,
लगता है इक नज़्म की इब्तदा होगी,
क्यों हूँ में इतना उदास.........

२)

सूखे होठों पर अटके लफ्ज़,
बिस्तर की सिलवटों पर सिसकती रात,
तेरी कलाई में खनकने को बेताब कंगन,
खामोशी भी करती है जैसे बात,
चिनाब का किनारा भी गाता है हीर,
लगता है इक नज़्म की इब्तदा होगी,
खाली निगाहों से,
तकता है मुझे कोई आज........