सोमवार, १३ जुलाई २००९

मौन आमंत्रण

1)

पूनम का चाँद
तुम्हें पा लेने का
मौन आमंत्रण
उष्रंखल होती मुक्त लहरें
तुझमे समा जाने का पागलपन
किनारों से टूट कर बिखरने का उन्माद
अपने अस्तित्व को खो देने की चाहत

पानी की बिखरी बूँदों में
मेरा अक्स चमकने लगा है

2)

तपती दोपहरी
पिघलता रेगिस्तान
पानी की स्याही से
रेत पर लिखा
मौन आमंत्रण
कतरा कतरा जागती प्यास
तू करीब हो कर भी कितना दूर
दहकती रेत पर
उतरने लगी है सुरमई चादर

आ दो पल बिता लें
जुदा होने से पहले

42 टिप्पणियाँ:

रंजना ने कहा…

Bas WAAH WAAH aur WAAH !!!!!

Murari Pareek ने कहा…

waah aa do pal bitaale jaane se pahle bahut dard bharaa lagaa mera bhi apnaa koi bichhdne waala hai !! yahi baat main use kah rahaa hun!! sahi waqt par sahi post padhi!!

M VERMA ने कहा…

आ दो पल बिता लें
जुदा होने से पहले
बहुत सुन्दर एहसास -- ख्वाहिश है.
रचना लाजवाब

रंजीत ने कहा…

अहा ! कितनी सुंदर है यह चाहत ! कितना पवित्र !! कितना शश्वत !!! ... जो सौंदर्य की श्रेष्ठ रचना के सामने भी व्यक्त हो सकता है और रेगिस्तान की तपतपाती असहनीय बीहड़ में भी और लहरों की निरुद्देश्य जिद में भी ... प्रेम सच में सुंदर बनाता है। सबको बनाता है, सब चीजों को बनाता है। जो प्रेम में है, वह निश्चित रूप से सुंदर भी है। शायद यही कारण है कि आपकी कविता हमेशा सुंदर बन जाती है। शब्दों और पंक्तियों की सीमा से परे जाती हैं आपकी कविताएं।
आ दो पल बिता लें
जुदा होने से पहले
बधाई।

Prem Farrukhabadi ने कहा…

आ दो पल बिता लें
जुदा होने से पहले
aur kya chahiye!!!!!!!!!bahut khoob!

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत उम्दा!! बस, लिखते चलो, हम पढ़ रहे हैं अभिभूत हो!!

ज्योति सिंह ने कहा…

ye shama banata rahe ,aur hame khichata raha ,kuchh kahate -sunte huye safar yu hi chalata raha .
marmsparshi rachana .bahut khoobsurat .

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

वाह बहुत लाजवाब..मन गदगद हो गया, बहुत शुभकामनाएं.

रामराम.

dhiru singh {धीरू सिंह} ने कहा…

सुन्दर एहसास, लाजवाब

ओम आर्य ने कहा…

पूनम का चाँद
तुम्हें पा लेने का
मौन आमंत्रण
उष्रंखल होती मुक्त लहरें
तुझमे समा जाने का पागलपन
किनारों से टूट कर बिखरने का उन्माद
अपने अस्तित्व को खो देने की चाहत

IN PANKTIYO ME AAPKE ANUPAM PYAAR KA DARSHAN HO RAHA HAI .....JAHA CHAHAT AAPANE CHARMOTKARSH PAR HAI
TO BHAWANAYE JANM JANMANTAR KO KHATM KAR DENE KO AATUR .....WAAH ...WAAH
तपती दोपहरी
पिघलता रेगिस्तान
पानी की स्याही से
रेत पर लिखा
मौन आमंत्रण
कतरा कतरा जागती प्यास
.....BAHUT .....BAHUT....BAHUT SUNDAR MERE PAAS KAHANE KO KUCHH NAHI HAI .......SIRF EHASAAS KE SIWAY....BAHUT BAHUT DHNYAAWAAD
AABHAR
OM ARYA

ओम आर्य ने कहा…
यह पोस्टलेखक के द्वारा निकाल दी गई है.
राज भाटिय़ा ने कहा…

वाह वाह वाह आप ने तो मदहोश कर दिया जनाब बहुत सुंदर.आ
दो पल बिता लें
जुदा होने से पहले
धन्यवाद

hem pandey ने कहा…

पानी की स्याही से
रेत पर लिखा
मौन आमंत्रण

- सुन्दर.

श्यामल सुमन ने कहा…

इस मौन आमंत्रण को गुंजायमान समर्थन दिगम्बर भाई।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…

gzb kee rchna.

‘नज़र’ ने कहा…

आ हा, बहुत सुन्दर प्रकटन
---
श्री युक्तेश्वर गिरि के चार युग

JHAROKHA ने कहा…

बहुत सुन्दर एवं भावनाप्रधान रचना ...बधाई

mehek ने कहा…

किनारों से टूट कर बिखरने का उन्माद
अपने अस्तित्व को खो देने की चाहत

पानी की बिखरी बूँदों में
मेरा अक्स चमकने लगा है
waah behad khubsurat ehsaas,aisa jaise dil ke kuch armann lafz banke nikle ho,lajawab.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

खूबसूरत अभिव्यक्ति,
मन गद-गद् हो गया।
बधाई।

अनिल कान्त : ने कहा…

आ दो पल बिता लें
जुदा होने से पहले .....वाह ...वाह

Anil Pusadkar ने कहा…

सुन्दर।

शोभना चौरे ने कहा…

पानी की स्याही से
रेत पर लिखा
मौन आमंत्रण
bhut khubsurt kalpna .sb kuch hai aur kuch bhi nhi .man ko khushbu dene vale shabd.
bdhai

sada ने कहा…

पानी की बिखरी बूँदों में
मेरा अक्स चमकने लगा है

बहुत ही सुन्‍दर अभिव्‍यक्ति ।

अल्पना वर्मा ने कहा…

वाह ! आप मखमली अहसासों को शब्दों का जामा पहना कर कविता बना देते हैं.
दोनों ही भावों की अभिव्यक्ति की खूबसूरत प्रस्तुति हैं.

अमिताभ श्रीवास्तव ने कहा…

digambarji,
yes, mujhe intjaar rahataa he aapki rachnao ka, man-mohak si, marm ko chhuti rachnao ka me aashiq ho gayaa hu. aapki shbd komalta ka deevana ho gayaa hu../aour meri is deevangee ko aap bhi khoob sambhaal rahe he, shandaar lekhan ke jariye.

moun aamantran-
poonam ka chand
mukt lahre
aour fir paani ki bikhari boonde..
prateeko ka esa istmaal aakhir kise nahi pagal karega?

registaan ka pighalna fir paani ki syaahee, wah ji behtreen.., ret par likhna bhi moun aamantran hota he,,,bavjud katra katra pyaas...jo savaal khada kare isake pahle hi isakaa uttar bhi mil jataa he turant ki 'too kareeb ho kar bhi kitanaa door....///'

aamantran ki
ab to aa..
aa do pal bita le
juda hone se pahle./"""""

maza aa gaya ji.

''ANYONAASTI '' {अन्योनास्ति} ने कहा…

बहुत खूब

M.A.Sharma "सेहर" ने कहा…

खूबसूरत शब्दों व भावों से सजी सुन्दर अभिव्यक्ति !!!

Babli ने कहा…

बहुत बढ़िया और सुंदर एहसास के साथ लिखी हुई आपकी ये लाजवाब रचना बहुत पसंद आया !

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा…

पानी की स्याही से
रेत पर लिखा
मौन आमंत्रण
वाह्! कितनी खूबसूरत अभिव्यक्ति है!यूं ही लिखते रहिए......

kumar Dheeraj ने कहा…

तपती दोपहरी
पिघलता रेगिस्तान
पानी की स्याही से
रेत पर लिखा
मौन आमंत्रण
कतरा कतरा जागती प्यास
तू करीब हो कर भी कितना दूर
दहकती रेत पर
उतरने लगी है सुरमई चादर
बेहद शानदार अभिवयक्ति लिखा है आपने । शुक्रिया

KK Yadav ने कहा…

उष्रंखल होती मुक्त लहरें
तुझमे समा जाने का पागलपन
किनारों से टूट कर बिखरने का उन्माद
अपने अस्तित्व को खो देने की चाहत
....Behad sundar Abhivyakti.

Prem ने कहा…

बहुत सुंदर अभिव्यक्ति ---शुभकामनायें

Mumukshh Ki Rachanain ने कहा…

लाजवाब अभिव्यक्ति,

मन गद-गद् हो गया।

बधाई स्वीकार करें

चन्द्र मोहन गुप्त

vikram7 ने कहा…

किनारों से टूट कर बिखरने का उन्माद
अपने अस्तित्व को खो देने की चाहत

पानी की बिखरी बूँदों में
मेरा अक्स चमकने लगा है
अति सुन्दर

रविकांत पाण्डेय ने कहा…

दिगंबर जी,
बहुत सुंदर शब्द-चित्र खींचा है आपने!!बिल्कुल जीवंत!! अच्छा है।

sandhyagupta ने कहा…

पानी की स्याही से
रेत पर लिखा
मौन आमंत्रण

Ye panktiyan khas taur par bahut achchi lagin.

मुकेश कुमार तिवारी ने कहा…

दिगम्बर जी,

दो कविताओं अलग-अलग भाचों मिलन और बिदा की बेला को इतनी खूबसूरती से जोड़ती है कि मैं तो स्तब्ध रह गया आपके हुनर पर।

उपमाओं का अप्रतिम और अनूठा प्रयोग, साधुवाद!

सादर,

मुकेश कुमार तिवारी

Nirmla Kapila ने कहा…

पानी की स्याही से
रेत पर लिखा
मौन आमंत्रण
कतरा कतरा जागती प्यास
तू करीब हो कर भी कितना दूर
दहकती रेत पर
उतरने लगी है सुरमई चादर
भावनाओं के सागर मे से निकले मोती शब्दो के्रूप मे कगज़ पर बिखर कर प्रेम रस बहा गये लाजवाब्

ज्योति सिंह ने कहा…

तपती दोपहरी
पिघलता रेगिस्तान
पानी की स्याही से
रेत पर लिखा
मौन आमंत्रण
कतरा कतरा जागती प्यास
तू करीब हो कर भी कितना दूर
दहकती रेत पर
उतरने लगी है सुरमई चादर

आ दो पल बिता लें
जुदा होने से पहले .
bahut sundar pankti .

'अदा' ने कहा…

आ दो पल बिता लें
जुदा होने से पहले
आपकी रचना के ये 'दो पल' दो जन्मों का सुख दे गए हैं..
बहुत खूबसूरत....
इसके आगे सिर्फ मौन...

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

ye rachana kai baar padha chuka..
bahut badhiya hai..
next ka wait kar raha hoon..

dhanywaad

Harsh ने कहा…

bahut khoob...........