रविवार, 26 जुलाई 2009

भोर का स्पंदन....

आलिंगन को व्याकुल
अलसाई सी रात
सिन्दूरी कम्बल ओढे
आ रहा प्रभात ........
प्रकाश में समां जाने का उन्माद
अस्तित्व खो देने की चाह
छाने लगे हैं देखो
प्रकृति के अद्भुद रंग
प्रारंभ होता है
साँसों का इक प्रवाह ......
चिडियों का चहचहाना
भंवरों का गुनगुनाना
लहरों का ठहर जाना
बेताब तितलियों का
आँगन में खिलखिलाना ......
चलने लगी है श्रृष्टि
सुबह की पगली किरण
उतर आई है तेरे सिरहाने
आ मिल कर करें
नव रश्मि का अभिनंदन
वो आ रहा है देखो
भोर का स्पंदन.........