मंगलवार, १० नवम्बर २००९

बिखरे शब्द ......

१)

तुम तक पहुँचने से पहले
कुछ अन्जाने शब्द
बिखर गये थे तुम्हारे रास्ते
अनदेखा कर शब्दों की चाहत
मसल दिए तुमने
उनके अर्थ, उनकी अभिव्यक्ति
उनकी चाहत, मौन अनुरक्ति
शब्दों का उमड़ता सैलाब
अब समुन्दर हो गया है
बिखरने को बेताब शब्द
अश्वथामा हो गए हैं
भटक रहे हैं तेरी तलाश में
दर बदर

सुना है द्वापर तो चला गया
कहीं कलयुग भी न गुज़र जाए .......

२)

कुरेद रहा हूँ
दिल में दबी
मुहब्बत की राख
सुना है
राख के ढेर में
चिंगारी दबी रहती है .......

50 टिप्पणियाँ:

Nirmla Kapila ने कहा…

मसल दिए तुमने
उनके अर्थ, उनकी अभिव्यक्ति
उनकी चाहत, मौन अनुरक्ति
शब्दों का उमड़ता सैलाब
अब समुन्दर हो गया है
क्या कहूँ निशब्द हूँ आज कई दिन बाद आयी हूँ नेट पर इसे कई बार पढूँगी तब मेरे दिमाग मे कुछ शब्द शायद आ जायें कि मैं इस रचना की तारीफ कर सकूम्म बहुत गहरे भाव हैं हमेशा की तरह
सुना है
राख के ढेर में
चिंगारी दबी रहती है .
चंद शब्दों मे इतनी बडी बात कहने की सामर्थ्य आप मे ही है बहुत सुन्दर बधई इस रचना के लिये

महफूज़ अली ने कहा…

तुम तक पहुँचने से पहले
कुछ अन्जाने शब्द
बिखर गये थे तुम्हारे रास्ते
अनदेखा कर शब्दों की चाहत
मसल दिए तुमने
उनके अर्थ, उनकी अभिव्यक्ति
उनकी चाहत, मौन अनुरक्ति
शब्दों का उमड़ता सैलाब
अब समुन्दर हो गया है ..

in panktiyon ne dil chhoo liya....

bahut hi behtareen abhivyakti....

yeh shabd hi to hain jo bikhar jaate hain yahan wahan ...toot kar gir jaate hain.....phir hamein hi to unhe chunna padta hai.....

kya kahun ab......... aapne itni subder rachna se nishabd kar diya hai.......

bahut hi sunder rachna....

संजय भास्कर ने कहा…

तुम तक पहुँचने से पहले
कुछ अन्जाने शब्द
बिखर गये थे तुम्हारे रास्ते
अनदेखा कर शब्दों की चाहत
मसल दिए तुमने
jaan nikal di hai aapki panktiyo ne
bahut hi sunder
संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

chandan ने कहा…

lajwab aur behtarin hai sahab.

M VERMA ने कहा…

बिखरने को बेताब शब्द
अश्वथामा हो गए हैं
यही तो विडम्बना है और भी ---
सुना है
राख के ढेर में
चिंगारी दबी रहती है .......
चिंगारियाँ धधक उठेंगी बस हवा तो लगने दीजिए

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

कुरेद रहा हूँ
दिल में दबी
मुहब्बत की राख
सुना है
राख के ढेर में
चिंगारी दबी रहती है .....

लाजवाब, बहुत ही नायाब.

रामराम.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

कुरेद रहा हूँ
दिल में दबी
मुहब्बत की राख
सुना है
राख के ढेर में
चिंगारी दबी रहती है .......

वाह...!
कितने कम शब्दों मे इतनी गहरी बात कह दी।
कमाल को सलाम।

अभिषेक ओझा ने कहा…

'बिखरने को बेताब शब्द
अश्वथामा हो गए हैं ' और राख में दबी चिंगारी ! वाह !

अक्षय-मन ने कहा…

आपकी लेखनी का जवाब नहीं है जिस शिखर आपके विचार आपके शब्द हैं वही आपके सबसे बड़ी पूँजी है.....
क्यूंकि अगर कोई ऐसा सोचता है की काश मे ऐसा लिख पाता तो वो आपकेलिये एक वरदान है.........
और हाँ मे ऐसा सोचता हूं............

पंकज सुबीर ने कहा…

मेरे विचार में ये छंदमुक्‍त कविता ही तुम्‍हारे मन की विधा है क्‍योंकि इसमें तुम अपने का पूरी तरह से निचोड़ कर अभिव्‍यक्‍त कर पाते हो । पहली कविता की अंतिम दो पंक्तियां विशेष रूप से पसंद आईं । कविता और कहानी अंत में निशान छोड़ जायें तो सफल होती हैं ।

रश्मि प्रभा... ने कहा…

सुना है द्वापर तो चला गया
कहीं कलयुग भी न गुज़र जाए .......
nahi,nahi....lahron ka prawaah gambheer hai ,usme shabd jo hain....bahut hi badhiyaa

"अर्श" ने कहा…

ab mujhe kuchh kahane ka bacha hi nahi sahib... guru ji ne jis tarah se tarif ki hai aapki ... jarur kalam ke jo tewar hain wo kamaal kar rahe hai... is bidhaa me to aap paarangat nikale bhaaee sahib... bahut bahut badhaayee ... in khubsurat kavitawo ke liye...


arsh

शरद कोकास ने कहा…

सुना है द्वापर तो चला गया
कहीं कलयुग भी न गुज़र जाए .......

यह इस बिम्ब का बहुत अच्छा प्रयोग है ।

MANOJ KUMAR ने कहा…

प्रयुक्त प्रतीक व उपमाएं नए हैं और सटीक भी। निःसंदेह यह एक श्रेष्ठ रचना है।

Apanatva ने कहा…

कुरेद रहा हूँ
दिल में दबी
मुहब्बत की राख
सुना है
राख के ढेर में
चिंगारी दबी रहती है ..
shubhkamnae.....
gaharai tak asar .chodane walee rachana hai

Badhai....

shikha varshney ने कहा…

बिखरने को बेताब शब्द
अश्वथामा हो गए हैं
बहुत ही गहरी बात कह दी आपने...दिल से मुबारकबाद कुबूल कीजिये.

ओम आर्य ने कहा…

सुना है द्वापर तो चला गया
कहीं कलयुग भी न गुज़र जाए .......
------------------------------
तेरे आने की इंतजार ने
मेरे आंखो ने फूलो से सजाया
तेरी लग्न पर एक
एक तू था कि
मेरे शहर मे तेरा आना
ना हुआ

मैने पलके सजायी
और तुने
सदियाँ..................
--------------------------
कुरेद रहा हूँ
दिल में दबी
मुहब्बत की राख
सुना है
राख के ढेर में
चिंगारी दबी रहती है .......
====================


यह आग की दरिया है और
डुब के जाना है .........आपके इस रचना को पढने के बाद यही याद आयी!बधाई!

अल्पना वर्मा ने कहा…

1-सुना है द्वापर तो चला गया
कहीं कलयुग भी न गुज़र जाए
Waah!bahut hi achchha likha hai..yah kavita shbdon ke safar ka agla padaav maluum deti hai.

ek uttam rachna!

2-aur yahi chingaari umeed ki roshni deti hai ..bahut khoob!

MUFLIS ने कहा…

सुना है
राख के ढेर में
चिंगारी दबी रहती है .......

हुज़ूर !!
ऐसी उम्दा और नायाब रचनाएं कही हैं आपने
शब्द ही चुनने मुश्किल हो गए हैं जिससे
कि मैं किसी ठीक ढंग से इन कविताओं की
तारीफ़ कर सकूं ...
भावनात्मक इज़हार बहुत ही सुन्दर है
अभिवादन स्वीकारें

SACCHAI ने कहा…

" sunder ...bahut hi badhiya ..accha laga padhker "

----- eksacchai { AAWAZ }

http://eksacchai.blogspot.com

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

कुरेद रहा हूँ
दिल में दबी
मुहब्बत की राख
सुना है
राख के ढेर में
चिंगारी दबी रहती है ..

बस कमाल ही है..बहुत सुन्दर.

राज भाटिय़ा ने कहा…

सुना है
राख के ढेर में
चिंगारी दबी रहती है .......
बहुत सुंदर दोनो कवितये लगी.
धन्यवाद

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा…

कुरेद रहा हूँ
दिल में दबी
मुहब्बत की राख
सुना है
राख के ढेर में
चिंगारी दबी रहती है .......

लाजवाब अभिव्यक्ति!!
कुरेदते रहिए...आग जरूर निकलेगी :)

manu ने कहा…

शब्द अश्वत्थामा हो गए हैं.....

कमाल की सोच...


सुना है द्वापर तो चला गया
कहीं कलयुग भी न गुज़र जाए .......
बहुत खूब.....

और आखिर में....
सुना है
राख के ढेर में
चिंगारी दबी रहती है ....

जाने क्या ढूंढती रहती हैं ये आँखें मुझ में.....याद आ गया,,,,

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

कुरेद रहा हूँ
दिल में दबी
मुहब्बत की राख
सुना है
राख के ढेर में
चिंगारी दबी रहती है .......

Hameshaa nahee, kabhee...kabhee !
Bahut khubsoorat khyaal

पदमजा शर्मा ने कहा…

धीरे धीरे रे मना धीरे सब कुछ होय , नास्वा जी .

sada ने कहा…

कुरेद रहा हूँ
दिल में दबी
मुहब्बत की राख
सुना है
राख के ढेर में
चिंगारी दबी रहती है ......

हर शब्‍द एक जादू लिये हुये है अपने आप में जाने कितना कुछ कहती हर एक पंक्ति बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

शोभना चौरे ने कहा…

satyug ho davapar ho kalyug ho ye sab beet bhi jay to kya fark padta hai har yug me ak jaisi hi pristhiti hoti hai fark itna hai beete hhuye yugo ko ham apne sihab se yad kart hai
अश्वथामा हो गए हैं
भटक रहे हैं तेरी तलाश में
दर बदर

shbdo ka ye sfar man ko choo gya .
achha pryog

raj ने कहा…

सुना है द्वापर तो चला गया
कहीं कलयुग भी न गुज़र जाए .......
fir koee naya yug shuru hoga.....कुरेद रहा हूँ
दिल में दबी
मुहब्बत की राख
सुना है
राख के ढेर में
चिंगारी दबी रहती है ......
chingari bhi kuch der rahti hai bahut der tak nahi....

अभिषेक प्रसाद 'अवि' ने कहा…

har baar kee tarah is baar bhi ek adbhutaas rachna...

योगेश स्वप्न ने कहा…

कुरेद रहा हूँ
दिल में दबी
मुहब्बत की राख
सुना है
राख के ढेर में
चिंगारी दबी रहती है .....

wah wah wah wah,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,.............

Harkirat Haqeer ने कहा…

कुरेद रहा हूँ
दिल में दबी
मुहब्बत की राख
सुना है
राख के ढेर में
चिंगारी दबी रहती है .......

बस चिंगारी से आग मत लगा दीजियेगा ....!!

Babli ने कहा…

शब्दों का उमड़ता सैलाब
अब समुन्दर हो गया है
बिखरने को बेताब शब्द
अश्वथामा हो गए हैं...
बेहद सुंदर पंक्तियाँ जो दिल को छू गई! इस शानदार और बेहतरीन रचना के लिए ढेर सारी बधाइयाँ!

वाणी गीत ने कहा…

द्वापर गया .....कलियुग ना चला जाये ...क्या कल्पना है ...!!
बहुत सुन्दर ...!!

Satya.... a vagrant ने कहा…

shabd ashwthama ho gaye hain
bahut um soch..
satya
kripya ko folow karne ka link batayen
main dhond nahi paya
satya

sangeeta ने कहा…

बिखरने को बेताब शब्द
अश्वथामा हो गए हैं
भटक रहे हैं तेरी तलाश में
दर बदर

mann ki gahri abhivyakti.....aur ye kshanika to gazab ki hai..


कुरेद रहा हूँ
दिल में दबी
मुहब्बत की राख
सुना है
राख के ढेर में
चिंगारी दबी रहती है .......

chingari mil jaye to hawa se aag fir jal uthe....bahut sundar ...badhai

गौतम राजरिशी ने कहा…

digambr jee, you are the best...जहाँ शब्दों का सारोकार आता है।

Priya ने कहा…

शब्दों का उमड़ता सैलाब
अब समुन्दर हो गया है
बिखरने को बेताब शब्द
अश्वथामा हो गए हैं

wow .....

Kalyug ke guzarne ke baat bhi lajwaab hai

योगेन्द्र मौदगिल ने कहा…

वाहवा...... शुभकामनायें...

रंजीत ने कहा…

ahha !!!
kya kamal kee rachna hai.

JHAROKHA ने कहा…

अब समुन्दर हो गया है
बिखरने को बेताब शब्द
अश्वथामा हो गए हैं
भटक रहे हैं तेरी तलाश में
दर बदर
बहुत ही खूबसूरत पंक्तियां ----निरुत्तर कर देने वाली हार्दिक बधाई स्वीकारें।
पूनम

Mrs. Asha Joglekar ने कहा…

शब्दों का उमड़ता सैलाब
अब समुन्दर हो गया है
बिखरने को बेताब शब्द
अश्वथामा हो गए हैं

बहुत खूबसूरत हैं आपकी रचनाएँ अनोखे बिंबों से भरपूर ।

ज्योति सिंह ने कहा…

कुरेद रहा हूँ
दिल में दबी
मुहब्बत की राख
सुना है
राख के ढेर में
चिंगारी दबी रहती है
wah bahut khoob ,satya ko kured gayi ye panktiyaan .umda

sandhyagupta ने कहा…

Apni lekhni ke dwara nit naye aayamon ko sparsh kar rahe hain aap.Yun hi likhte rahiye.

creativekona ने कहा…

कुरेद रहा हूँ
दिल में दबी
मुहब्बत की राख
सुना है
राख के ढेर में
चिंगारी दबी रहती है ......

कम शब्दों में उकेरी गयी सशक्त रचना।
हेमन्त कुमार

KAVITA RAWAT ने कहा…

सुना है द्वापर तो चला गया
कहीं कलयुग भी न गुज़र जाए .......

Samundar ki gahrai liye aapki rachna or kalyungi bikhrao ko pardrashit karte bhav bahut hi satik lage.
Badhai

Devendra ने कहा…

बिखरे शब्दों की तलाश !
जाने किस युग में इनकी हसरत होगी पूर्ण!!
वाह!!
आप शब्दों के जादूगर लगते हैं।

Harkirat Haqeer ने कहा…

तुम तक पहुँचने से पहले
कुछ अन्जाने शब्द
बिखर गये थे तुम्हारे रास्ते

पहले भी पढ़ी थी ये नज़्म एक बार फिर आई हूँ....

बहुत ही लाजवाब........उफ्फ्फ.......भीतर तक उतर जाता है दर्द ....!!

श्याम कोरी 'उदय' ने कहा…

.... सुन्दर व प्रसंशनीय रचनाएं !!!

वन्दना ने कहा…

deri ke liye maafi chahti hun.
bahut hi gahre ahsaason mein doobi rachna dil ko andar tak chhoo gayi.........aur sabne itna kah diya hai ki ab to kahne ko kuch bacha hi nhi.