सोमवार, 30 नवंबर 2009

न्याय की आशा यहाँ परिहास है

इस व्यवस्था पर नहीं विशवास है
न्याय की आशा यहाँ परिहास है

कल जहां दंगा हुवा था नगर में
गिद्ध चील पुलिस का निवास है

बस उसी का नाम है इस जगत में
अर्थ शक्ति का जहां विकास है

समझ में आया हुई बेटी विदा जब
घर का आँगन क्यों हुवा उदास है

आपके होठों पर इक निश्छल हंसी हो
बस यही इस ग़ज़ल का प्रयास है