रविवार, 6 दिसंबर 2009

हार में ही जीत है तो हार क्यों नहीं

आस्था विशवास का विस्तार क्यों नहीं
आदमी को आदमी से प्यार क्यों नहीं

भ्रमर भी है, गीत भी है, रीत भी
पुष्प में फिर गंध और श्रृंगार क्यों नहीं

पा लिया दुनिया को मैंने हार कर दिल
हार में ही जीत है तो हार क्यों नहीं

दिल के बदले दिल मिले, आंसू नहीं
इस तरह से प्यार का व्यापार क्यों नहीं

सत्य ही कहता है आईना हमेशा
आईने को खुद पर अहंकार क्यों नहीं