गुरुवार, 26 फ़रवरी 2009

झूमती पुरवाइयां

ब्लॉग जगत के सुपरिचित रचनाकार हमारे गुरु श्री "पंकज सुबीर जी" को देश की सबसे बड़ी साहित्यिक संस्था "भारतीय ज्ञानपीठ" ने अपनी नवलेखन पुरुस्कार योजना के तहत वर्ष 2008 के तीन श्रेष्ठ युवा कथाकारों में सम्मिलित किया है.हम सब के लिए यह गर्व की बात है. पंकज को जी इस बात के लिए बहुत बहुत बधाई.

प्रस्तुत है ये ग़ज़ल पंकज जी के नाम. वैसे आप सब को बता दूं इस ग़ज़ल को गुरुदेव ने आज ही पढने लायक बना कर भेजा है.


गूंजती थीं जिस मुहल्ले में कभी शहनाइयां
दर्द है बिखरा हुवा, बिखरी हुयी तन्हाइयां

कैसा वासंती ये मौसम अब के आया है यहां
कोयलें सहमी हैं और सहमी हुई अमराइयां

हो गए खामोश आधी रात में दीपक सभी
रात भर चलती रहीं इश्राक की पुरवाइयां

सांस पत्‍थर को है लेते देखना तो देख लो
तुम अजंता के बुतों में नाचती परछाइयां

बस तेरा ही नूर फैला है फिजां में हर तरफ
ये तसव्‍वुफ जानती हैं झूमती पुरवाइयां

झूठ का रंगीन चेहरा इस कदर छाया हुवा
आईने से मुंह छुपाती हैं यहाँ सच्चाइयां

थाह तेरे दिल की ही बस मिल न पाई है मुझे
यूं तो मैंने नाप लीं सागर की सब गहराईयां

साथ तेरा मिल गया आसान हैं अब रास्‍ते
थीं वगरना हर कदम पर मुश्किलें कठिनाइयां

(इश्राक - प्रभात, चमक, उषा, तसव्वुफ़ - रहस्य, गूढ़ ज्ञान)

शनिवार, 21 फ़रवरी 2009

जिंदगी का गीत हो वो गीत लाजवाब

दिल्ली और देहरादून में खिलती हुवे सूरज के नीचे नर्म सर्दी में गुजारे कुछ पल, गौतम जी से छोटी सी हसीन सी यादगार मुलाक़ात, समीर जी (उड़नतश्तरी वाले) से फ़ोन पर हुयी बात और भी न जाने कितने खूबसूरत लम्हों को समेटे अपने छोटे से शहर दुबई में वापस आने के बाद, पेश है ये ताज़ा ग़ज़ल गौतम जी के नाम ...........


जानता हूँ रख न पायेगा कभी हिसाब
नाप कर जो रौशनी बांटेगा आफताब

यूँ तो सारे गीत होते खूबसूरत
जिंदगी का गीत हो वो गीत लाजवाब

जिसमें कोई दाग न धब्बे पड़े हों
क्यूँ नही फ़िर ढूंढ लें हम ऐसा माहताब

हमने अपने दर्द को कुछ यूँ छुपाया
ओस की बूंदों में पिघलता रहा अज़ाब

यूँ अंगूठा टेक हूँ, बे इल्म हूँ पर
जिंदगी की स्याही से लिक्खी मेरी किताब

पोथियाँ पढता रहा कुछ मिल पाया
ढाई आखर प्रेम से गुलज़ार मेरा ख्वाब

घर मेरा कुछ यूँ सजा आने से तेरे
रात रानी खिल उठी खिलता रहा गुलाब

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2009

साए में संगीन के फूले फले

आज से पूरे एक सप्ताह के लिए छुट्टी ले रहा हूँ, दुबई की भागमभाग जिंदगी से दूर वतन की खुशबू के बीच, दिल्ली की सर्दी का आनंद लेने, हो सका तो देहरादून गौतम जी से मुलाक़ात करने ..........

जाते जाते पेश है एक ग़ज़ल, प्रकाश बादल जी के कहे अनुसार मीटर की परवाह किए बगैर, अच्छी बुरी तो आप ही जाने........

अब नही उठते हैं दिल में ज़लज़ले
पस्त हो गए हमारे होंसले

लाल पत्ते, लाल बाली गेहूं की
साए में संगीन के फूले फले

मिल गयी है न्याय की कुर्सी उसे
कर रहा अपने हक़ में फैंसले

थक गया पर साथ चलता रहूँगा
दूर तक जो साथ तू मेरे चले

रात गयी चाँद क्यों छिपता नही
सोच रहा सूरज पीपल तले

याद माँ की आ गयी विदेश में
दफअतन आँख से आंसू ढले

छाछ भी पीते हैं फूंक मार कर
दूध से हैं होठ जिन के जले

जिंदगी भर लौट कर न जाऊँगा
आज मेरा रास्ता बस रोक ले

गोलियों की बात ही समझेगे वो
गोलियों से कर रहे जो फैंसले

रेत की दीवार से ढह जायेंगे
जिस्म जिनके हो गए खोखले

रविवार, 8 फ़रवरी 2009

ज़ख्म हमेशा खिले हुवे

टूटी चप्पल, चिथड़े कपड़े, हाथ पैर हैं छिले हुवे
खिचडी दाड़ी, रीति आँखें, ज़ख्म हमेशा खिले हुवे

रोटी पानी, कपड़े लत्ते, बिखरा घर बिखरा आँगन
बिखरा जीवन, टूटे सपने, होठों सभी के सिले हुवे

झूठे रिश्ते, लोग पराये, मैं सच्चा झूठी दुनिया
ख़त्म हुवे सब शिकवे सारे, ख़त्म ये सारे गिले हुवे

नियम खोखले, बातें कोरी, कोरा मत, कोरा गर्जन
कोरी वाणी, कोरा दर्शन, नींव सभी के हिले हुवे

गुंडा गर्दी गली मोहल्ले,जिसकी लाठी उसकी भैंस
लूट मची है प्रजा तंत्र में, मानुस सारे पिले हुवे

मार पड़ी कमजोरों पर, चाहे कोई मज़हब हो
मंदिर मस्जिद गिरजे लगता आपस में हैं मिले हुवे

सोमवार, 2 फ़रवरी 2009

साँस का बस खेल है जीवन मरन

सूर्य से पहले है जिसका आगमन
स्वयं को पाने का जो करता सृजन

छू वही सकता हैं ऊंचे शिखर को
कर गुज़रने की लगी हो जब लगन

कौन सी बाधाएं रस्ता रोक लेंगी
जल रही हो मुक्ति की दिल में अगन

स्वयं को बाती बना तिल तिल जले
जिंदगी बन जायेगी उसकी हवन

मुक्त कर दो, तोड़ दो बंधन पुनः
किस के रोके रुका है बहता पवन

काल की सीमाओं में बंधा हुवा
साँस का बस खेल है जीवन मरन

सत्य तो बस एक है "इदं न मम"
देह वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी गगन