मंगलवार, 19 जनवरी 2010

हिल गई बुनियाद घर फिर भी खड़ा था

ये ग़ज़ल पुनः आपके सामने है .......... गुरुदेव पंकज जी का हाथ लगते ही ग़ज़ल में बला की रवानगी आ गयी है ......

यूँ तो सारी उम्र ज़ख़्मों से लड़ा था
हिल गई बुनियाद घर फिर भी खड़ा था

बस उबर पाया नहीं तेरी कसक से
भर गया वो घाव जो सर पे पड़ा था

वो चमक थी या हवस इंसान की थी
कट गया सर जिसपे भी हीरा जड़ा था

कोई उसके वास्‍ते रोने न आया
सच का जो झंडा लिए था वो छड़ा था

आज का हो दौर या बातें पुरानी
सुहनी के लेखे तो बस कच्चा घड़ा था

बीज मोती, गेंहू सोना, धान हीरा
खूं से सींचा तो खजाना ये गड़ा था