शनिवार, 30 जनवरी 2010

सुना है अब यादें भी साँस लेती हैं ........

यादों की देहरी लाँघ
इक लम्हा सजीव हुवा

भोर सिंदूरी ने
ली अंगड़ाई
रात की काली
चादर हटाई

हवा गुनगुनाई
कली मुस्कुराइ
चुपके से मैने ओढ़ ली
तेरे एहसास की गुलाबी रज़ाई

न जाने कब में सो गया

वो पुराना लम्हा
कुछ नये एहसास सिमेटे
यादों के जंगल में
वापस लौट गया

अब नयी यादें
अक्सर पुरानी यादों से मिलती हैं
कुछ नये ख्वाब
नये सपने संजोती हैं

सुना है
अब यादें भी साँस लेती हैं ........