सोमवार, 7 जून 2010

झूठ

नही नही
में यह नहि कहूँगा की ये मेरा अंतिम झूठ है
इससे पहले भी मैने कई बार
सच की चाशनी लपेट कर
कई झूठ बोले हैं

कई बार अंजाने ही
झूठ बोलते अटका हूँ
पर हर बार मेरी बेशर्मी ने
ढीठता के साथ सच पचा लिया

झूठ तो कर्ण ने भी बोला था
ज्ञान के लोभ में
और झूठ की बैसाखी पकड़
सच तो युधिष्ठिर ने भी नही कहा

फिर तुम से बेहतर कौन समझ सकता है
झूठ तो उस रोज़ भी कहा था मैने
जब जानते हुवे भी तुमको
स्वप्न सुंदरी से सुंदर कहा
फिर तुम्हारे बाद भी ये झूठ
न जाने कितनों को
सच का आवरण लपेट कर कहा

झूठ तो हर बार बोलता हूँ
अपने आप से
अपनी आत्मा से
अपने वजूद से

पता है …?
सच की दहलीज़ पर झूठ का शोर
सच को बहरा कर देता है
वीभत्स सच को कोई देखना नही चाहता
सच आँखें फेर लेता है

अब तो मेरा वजूद
झूठ के दलदल में तैरना सीख गया है

हाँ मैं अब भी यह नहि कह रहा
की ये मेर अंतिम और अंतिम झूठ नही है

86 टिप्पणियाँ:

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

पता है …?
सच की दहलीज़ पर झूठ का शोर
सच को बहरा कर देता है
वीभत्स सच को कोई देखना नही चाहता
सच आँखें फेर लेता है

बहुत सटीक कहा है...हर इंसान का सच....बहुत अच्छी लगी आपकी रचना

स्वप्निल कुमार 'आतिश' ने कहा…

kya baat hai ... jhooth naam ki yah nazm badi sachhi hai digambar ji ... mujhe pasand aayi aa[pki rachana

'उदय' ने कहा…

पता है …?
सच की दहलीज़ पर झूठ का शोर
सच को बहरा कर देता है
... अद्भुत भाव .... प्रसंशनीय रचना, बधाई !!!!

arvind ने कहा…

सच की दहलीज़ पर झूठ का शोर
सच को बहरा कर देता है
वीभत्स सच को कोई देखना नही चाहता
सच आँखें फेर लेता है
.....bahut hi satik baat. aapki rachna kafi acchhi lagi.

Parul ने कहा…

is se bada sach hai hi nahi......!!

Suman ने कहा…

nice

मीनाक्षी ने कहा…

सोचने को विवश करती रचना...असल मे झूठ ही एक ऐसा सच है जिसके बिना हम नहीं रह सकते... झूठ को सच का जामा पहना कर कभी अपने को तो कभी दूसरो को खुश करने की कोशिश मे लगे रहते हैं...

वन्दना ने कहा…

क्या कहूँ……………आपने तो सच कह दिया ………………सबसे भाग सकता है इंसान मगर खुद से नही………………………और हर बार अपनी ही आत्मा की गिरफ़्त मे फ़ँस जाता है………………………कितना ही झूठ बोल ले……………कितना ही झूठ के दलदल मे तैर ले सच बाहर आता ही है……………एक सामयिक रचना।

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

हमारे देश के कर्णधार तो इस सफाई से झूठ बोलते हैं कि झूठ भी शर्मा जाये...
आपको एक सुन्दर रचना के लिये धन्यवाद..
कौन सुनना चाहता है सच? कोई नहीं..

shikha varshney ने कहा…

पता है …?
सच की दहलीज़ पर झूठ का शोर
सच को बहरा कर देता है
वीभत्स सच को कोई देखना नही चाहता
सच आँखें फेर लेता है
क्या बात कही है सटीक ओर लाजबाब

ज्योति सिंह ने कहा…

झूठ तो हर बार बोलता हूँ
अपने आप से
अपनी आत्मा से
अपने वजूद से

पता है …?
सच की दहलीज़ पर झूठ का शोर
सच को बहरा कर देता है
वीभत्स सच को कोई देखना नही चाहता
सच आँखें फेर लेता है
waah !bahut khoob ,aaj to is rachna padhkar jhoot bhi sach sa lagne laga ,ye to bada sahara hai jeene ke liye .

Apanatva ने कहा…

sachhaee se likhee ek imaandar rachana......bahut pasand aaee .
daldal me phasane kee jagah tairna seekh gaye ye to badee uplabdhee hai aaj ke zamane me..........
Aabhar

शोभना चौरे ने कहा…

jhooth ki pribhasha hi badal gai hai .
jhooth itna aage nikal gya hai aur sach achal khda hai apni jgh .
aur ye bhi sach hai jhooth ke bina sach ka astitv kahan ?
bahut sachhi rachna .

रश्मि प्रभा... ने कहा…

excellent

M VERMA ने कहा…

सच की दहलीज़ पर झूठ का शोर
सच को बहरा कर देता है
और फिर सच भी अक्सर झूठ से ही पनाह मांगता है. अंतर्द्वन्द की रचना
नायाब

kshama ने कहा…

Ek maasoom bachha janm leta hai..jhoot kaa ka lavlesh bhi paas nahi hota..na jane,kab wo masoomiyat duniyadari kaa bhes pahan,kaalikh ban jaati hai..yah kaisa pariwartan hai?Jhoot kaa bojh uthaye insaan jeeta rahta hai..

seema gupta ने कहा…

फिर तुम्हारे बाद भी ये झूठ
न जाने कितनों को
सच का आवरण लपेट कर कहा
" कितना गहरा शब्द चित्रण है......एक स्वीकृति है, आत्म मंथन है....."
अब तो मेरा वजूद
झूठ के दलदल में तैरना सीख गया है
"मगर पश्चाताप का भाव कहीं नहीं....."
यही इस रचना की विशेषता है.......
regards

seema gupta ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
इस्मत ज़ैदी ने कहा…

झूठ तो हर बार बोलता हूँ
अपने आप से
अपनी आत्मा से
अपने वजूद से


सच की दहलीज़ पर झूठ का शोर
सच को बहरा कर देता है
वीभत्स सच को कोई देखना नही चाहता
सच आँखें फेर लेता है

बिल्कुल सच्ची नज़्म है ,
बहुत ख़ूबसूरती से ज़माने की सच्चाई को मंज़र ए आम पर लाए हैं आप ,
बधाई हो एक अच्छी नज़्म के लिए

kunwarji's ने कहा…

ek manovagyaanik rachna sir ji......

sachcha vishleshan...

kunwar ji,

अर्चना तिवारी ने कहा…

सच कह रहे हैं ....
झूठ तो हर बार बोलता हूँ
अपने आप से
अपनी आत्मा से
अपने वजूद से

अनामिका की सदाये...... ने कहा…

sach ko bhi kahna kitna mushkil hai...jo bhi kaha aapne sach kaha.

आशीष/ ASHISH ने कहा…

Naswa ji,
Kavita ka sheershak galat hai.....
Badal kar 'Sach' kar lijiye.....
Kyun?
Kyunki aapne sach hi to bola hai!
Jai Ho!

डॉ टी एस दराल ने कहा…

इस सच को स्वीकारना भी एक साहस का काम है ।
सही है , हम सब झूठ के दलदल में फंसे रहते हैं ।
बढ़िया रचना ।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

इस जहाँ में सब जगह पर झूठ का ही शोर है!
क्योकि सबके दिल जिगर में पनपता इक चोर है!!

Udan Tashtari ने कहा…

सच की दहलीज़ पर झूठ का शोर
सच को बहरा कर देता है
वीभत्स सच को कोई देखना नही चाहता
सच आँखें फेर लेता है


-गज़ब महाराज...बहुत सटीक बात कही!! आभार.

अल्पना वर्मा ने कहा…

सच की दहलीज़ पर झूठ का शोर
सच को बहरा कर देता है
वीभत्स सच को कोई देखना नही चाहता
सच आँखें फेर लेता है

कितना बड़ा सच है यह भी !

बहुत ही अच्छी रचना है.

dhiru singh {धीरू सिंह} ने कहा…

झूठ का इतना सही सच पहले नही पढा

aarya ने कहा…

सादर वन्दे !
झूठ में ही जीते हैं, झूठे ही आज लोग
झूठ हैं आप झूठ हैं हम यही किस्सा पुँराना है !
रत्नेश त्रिपाठी

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

फिर तुम से बेहतर कौन समझ सकता है
झूठ तो उस रोज़ भी कहा था मैने
जब जानते हुवे भी तुमको
स्वप्न सुंदरी से सुंदर कहा
फिर तुम्हारे बाद भी ये झूठ
न जाने कितनों को
सच का आवरण लपेट कर कहा

दिगंबर जी शायद एक हल्की सी ब्रेक ले ली थी आपने ..मै भी कुछ देर से पहुँचा पाया आपके ब्लॉग पर पर हमारे लिए आप की रचनाएँ उतनी ही महत्वपूर्ण है जैसे पहले थी...इतने सुंदर भाव और शब्दों से सजी आपकी यह पोस्ट भी लाज़वाब....अब उम्मीद करते है आप निरंतर अपने बेहतरीन लेखनी से हम सब को लाभान्वित करते रहेंगे..लाभान्वित से आशय है की हमें आपकी रचनाओं को पढ़ कर बहुत अच्छा लगता है...नमस्कार स्वीकारें..

सम्वेदना के स्वर ने कहा…

आपका मौन टूटा… हमारा सौभाग्य..और विश्वास करें, यह सच है... सीधा सच्चा सच...बिना चाशनी के... बेहतरीन रचना...

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

आपका पूरा कबिता अपने आप में एगो नंगा सच है, दिगम्बर जी!! सबसे अच्छा बात जो हमको लगा कि जिन्नगी भर झूठ का दलदल सुनते आए थे..आप त इसपर भी तरने वाला लोग बता दिए… नमन है आपको!!

महफूज़ अली ने कहा…

कमाल है ....अभी तक इस पोस्ट पर किसी ने पसंद का चटका नहीं मारा.... पसंद के एक चटके के साथ.... यह पोस्ट बहुत टची लगी.... बहुत अच्छी पोस्ट....

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

कल मंगलवार को आपकी रचना ... चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर ली गयी है



http://charchamanch.blogspot.com/

सुमन'मीत' ने कहा…

झूठ की सच्ची तस्वीर बता दी आपने । बहुत सुन्दर.........

राज भाटिय़ा ने कहा…

वाह जी अद्भुत ओर सुंदर

मनोज कुमार ने कहा…

बड़ी ढीठता के साथ अत्म मंथन भी किया आपने, और जो सच सामने आय वह यह है कि

सच की दहलीज़ पर झूठ का शोर
सच को बहरा कर देता है
वीभत्स सच को कोई देखना नही चाहता
सच आँखें फेर लेता है

हर्षिता ने कहा…

बहुतखूब,लाजवाब,बेहतरीन नासवाजी।

Monika ने कहा…

वाह लाजवाब. सच के सामने झूठ की हिम्मत नही होती और पत्थरो की पलके कभी आँसू नही रोती. क्योकि हक़ीकत को कभी भी झुठलाया नही जा सकता. साभार इतनी सुंदर रचना के लिए.

संजीव द्विवेदी ने कहा…

कई बार अंजाने ही
झूठ बोलते अटका हूँ
पर हर बार मेरी बेशर्मी ने
ढीठता के साथ सच पचा लिया ।

बहुत बढ़िया ।

महावीर बी. सेमलानी ने कहा…

ati sunder...nice.
thanx2u

Vivek Jain ने कहा…

bahut sundar
vivj2000.blogspot.com

Gourav Agrawal ने कहा…

झूठ पर सच्ची कविता को प्रणाम

बेचैन आत्मा ने कहा…

..झूठ बोलते अटका हूँ
पर हर बार मेरी बेशर्मी ने
ढीठता के साथ सच पचा लिया..

..सच्ची बात हमेशा अच्छी लगती है ..उस पर आप जैसे कलमकार हों तो क्या कहना ..!
...बधाई.

Prem Farrukhabadi ने कहा…

अब तो मेरा वजूद
झूठ के दलदल में तैरना सीख गया है

हाँ मैं अब भी यह नहि कह रहा
की ये मेर अंतिम और अंतिम झूठ नही है
aaina dikhati rachna sarahneey hai.
magar hum nahin sudhrenge ye bhi sabko pata hai.fir bhi aisi rachna rachne ke liye Badhai!!

सुलभ § Sulabh ने कहा…

इस रचना में सब कुछ साफ़ साफ़ कह दिया आपने.

वो क्या कहते हैं,,,, आइना दिखाना...! झूठ के बिना जीवन शायद जीवन गति नहीं पकड़ता

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

कई बार अंजाने ही
झूठ बोलते अटका हूँ
पर हर बार मेरी बेशर्मी ने
ढीठता के साथ सच पचा लिया

बस इतना ही कहूंगा लाजबाब !

माधव ने कहा…

इस रचना में सब कुछ साफ़ साफ़ कह दिया आपने

रवि कुमार, रावतभाटा ने कहा…

सच की दहलीज़ पर झूठ का शोर
सच को बहरा कर देता है...

सच और हितों के विरोधाभासों से उपजा झूंठ...
बेहतर कविता...धन्यवाद...

दीपक 'मशाल' ने कहा…

झूठ तो कर्ण ने भी बोला था
ज्ञान के लोभ में
और झूठ की बैसाखी पकड़
सच तो युधिष्ठिर ने भी नही कहा

बहुत ही पसंद आयी ये सत्य को उद्घाटित करती कविता..

'अदा' ने कहा…

आप सचमुच बहुत ही अच्छा लिखते हैं...
बहुत पसंद आई आपकी कविता...

Dimpal Maheshwari ने कहा…

sach ko byaan karti ek sachchi kavita...kyonki me juth nhin bolta....???..ye kahne wale hajaro hain par bolne wale bhi lakhon hain..

alka sarwat ने कहा…

पर भाई ,हमसे तो आप सच ही बोलियेगा वरना नुक्सान आप ही को होगा
सर दर्द को सर दर्द ही बताकर आप फायदे में रहेंगे ,नहीं तो ........
वैसे अंतिम विजय तो सत्य की ही होती है

alka sarwat ने कहा…

www.kavitakosh.org/alkasarwatmishra
कभी कभी चढ़ती खुजली का एक इलाज ये नजर आया
जरा देखें

alka sarwat ने कहा…

www.kavitakosh.org/alkasarwatmishra
कभी कभी चढ़ती खुजली का एक इलाज ये नजर आया
जरा देखें

alka sarwat ने कहा…

www.kavitakosh.org/alkasarwatmishra
कभी कभी चढ़ती खुजली का एक इलाज ये नजर आया
जरा देखें

rashmi ravija ने कहा…

सच की दहलीज़ पर झूठ का शोर
सच को बहरा कर देता है
वीभत्स सच को कोई देखना नही चाहता
सच आँखें फेर लेता है
निर्मम सत्य उकेरती पंक्तियाँ.....हर इंसान को आईना दिखाती हुई कविता...

रचना दीक्षित ने कहा…

बेहद अच्छी पोस्ट. चलिए अच्छा हुआ आप जल्दी ही हमारी श्रेणी में आ गए और स्वीकार भी कर लिया.मैं अपने झूठ की कथा भी लगे हाथ सुना दूँ

"झूठ के पांव"

झूठ के पांव निकलते देखा है
सच पे सवार होते देखा है
कान्हा की आड़ में,
लीला का नाम ले, कदाचार देखा है
पवन सुतों के सीने में, व्यभिचार देखा है
मर्यादा पुरुशोत्त्मों को करते, भ्रष्टाचार देखा है
अपनी आयु को लीलने को,
जानकी को लाचार देखा है
दूर क्यों जाऊं कहीं,जब पतियों को,
करते दुश्शासन सा, दुराचार देखा है
किस किस की गवाही दूँ मैं,
कौन मानेगा
जब मैंने
झूठ के पांव निकलते देखा है
सच पे सवार होते देखा है

अपूर्व ने कहा…

झूठ की तहें उधेड़ती आपकी इस कविता मे दरअसल हमारा भी सच उभर के सामने आता है..शर्मसार करने की हद तक...वो कहते हैं कि एक झूठ को सौ बार बोलने पर सच मे तब्दील हो जाता है..मगर मुझे लगता है कि झूठ सौ बार बोलने से वो इतना बेशर्म हो जाता है कि सच के अस्तित्व को नकार सके..और यह झूठ की आदन हो जाना ही हमारे लिये सच को गैरजरूरी सा बना देती है..!..मगर इतनी अच्छी और ईमानदार कविता पढ़ कर सच्चाई की अहमियत सामने आना लाजिमी ही है...बहुत खूब!!

pawan dhiman ने कहा…

वीभत्स सच को कोई देखना नही चाहता..सच आँखें फेर लेता है..... बहुत खूब.

आचार्य जी ने कहा…

आईये जानें … सफ़लता का मूल मंत्र।

आचार्य जी

संजय भास्कर ने कहा…

daswa ji namaskar
क्या बात कही है सटीक ओर लाजबाब

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत ही पसंद आयी ये सत्य को उद्घाटित करती कविता..

anjana ने कहा…

बढ़िया रचना ।

Babli ने कहा…

बहुत ख़ूबसूरत और लाजवाब रचना लिखा है आपने जो काबिले तारीफ़ है! बधाई!

हिमान्शु मोहन ने कहा…

और झूठों की प्रतीक्षा में। बढ़िया रचना लगी ये।

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

kitni pyari baat kahi aapne.......ye mera antim aur antim jhooth nahi hai.....:)

bahut khubshurat!!

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

kitni pyari baat kahi aapne.......ye mera antim aur antim jhooth nahi hai.....:)

bahut khubshurat!!

रंजना ने कहा…

क्या कहूँ....सुपर्ब...सिम्पली सुपर्ब !!!!

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

झूठ तो हर बार बोलता हूँ
अपने आप से
अपनी आत्मा से
अपने वजूद से

बहुत खूब ......बहुत पसंद आई यह रचना

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

काश, ऐसा आत्मबल हम सबमें होता...
--------
ब्लॉगवाणी माहौल खराब कर रहा है?

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

वाह. दाढी में तिनका नहीं, तिनकों की दाढी है.

JHAROKHA ने कहा…

बहुत ही सशक्त रचना।खासकर इन पंक्तियों का जवाब नहीं--- पता है …?
सच की दहलीज़ पर झूठ का शोर
सच को बहरा कर देता है
वीभत्स सच को कोई देखना नही चाहता
सच आँखें फेर लेता है
-

Avinash Chandra ने कहा…

kadwa hai, khatta hai......takleefdeh bhi hai

lekin anupan hai.

aapke paas jab bhi aata hun, iske alawa koi shabd nahi hota mere paas...

badhayee nahi dunga, dhanyawaad kahunga jo aisa likha aapne

कविता रावत ने कहा…

झूठ तो कर्ण ने भी बोला था
ज्ञान के लोभ में
और झूठ की बैसाखी पकड़
सच तो युधिष्ठिर ने भी नही कहा
...Jhoot ke shaswat satya ko gahrayee se udghatit kiya hai aapne..

निर्मला कपिला ने कहा…

पता है …?
सच की दहलीज़ पर झूठ का शोर
सच को बहरा कर देता है
वीभत्स सच को कोई देखना नही चाहता
सच आँखें फेर लेता हैब तो आप झूठ नही बोल रहे हर पंक्ति की संवेदना दिल का सच ब्याँ कर रही है बहुत सुन्दर रचना है बधाई

रंजीत/ Ranjit ने कहा…

jabardast

लता 'हया' ने कहा…

बहुत -बहुत शुक्रिया ,
प्रगति ,पहली मुलाक़ात ,तरही मुशायरा के शेर ,बंधुआ -भविष्य या नज़्म .
मैं जो भी कहूँगी सच- सच कहूँगी ,'झूठ 'नहीं जनाब;वाक़ई सबमें है दम

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना आभार

Indli ने कहा…

नमस्ते,

आपका बलोग पढकर अच्चा लगा । आपके चिट्ठों को इंडलि में शामिल करने से अन्य कयी चिट्ठाकारों के सम्पर्क में आने की सम्भावना ज़्यादा हैं । एक बार इंडलि देखने से आपको भी यकीन हो जायेगा ।

Amitraghat ने कहा…

"खुद से झूठ बोलना बहुत मुश्किल है पर लोग बोलते हैं क्योंकि ये सबसे आसान होता है जैसे मोबाईल से बास से । बास भी जानता है और आत्मा भी कि बन्दा झूठ बोल रहा है पर वो चुप रहते हैं और आने वाले समय इंतज़ार करते हैं .....बेहतरीन लिखा है आपने सर..."

sandhyagupta ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
sandhyagupta ने कहा…

Rachna anuthi aur prabhavi hai.
Aur haan,main jhuth nahin bol rahi.

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

नही नही
में यह नहि कहूँगा की ये मेरा अंतिम झूठ है
इससे पहले भी मैने कई बार
सच की चाशनी लपेट कर
कई झूठ बोले हैं

अद्भुत .....!!

आचार्य जी ने कहा…

प्रभावशाली लेखन।

( आइये पढें ..... अमृत वाणी। )

boletobindas ने कहा…

कुछ लिखना बाकी नहीं रह गया है दोस्त। क्या शानदार कविता।