बुधवार, 16 जून 2010

शब्द-कथा

प्रस्तुत है मेरी पहली व्यंग रचना जो हिन्द-युग्म में भी प्रकाशित हो चुकी है ... आशा है आपको पसंद आएगी


शब्दकोष से निकले कुछ शब्द
बूड़े बरगद के नीचे बतियाने लगे
इक दूजे को अपना दुखड़ा सुनाने लगे

इंसानियत बोली
में तो बस किस्से कहानियों में ही पलती हूँ
हाँ कभी कभी नेताओं के भाषणों में भी मिलती हूँ
लोगों से अब नही मेरा संबंध
दुर्लभ प्रजाति की तरह
मैं भी लुप्त हो जाऊंगी
शब्द कोष के पन्नों में
हमेशा के लिए सो जाऊंगी

तभी करुणा के रोने की आवाज़ आई
सिसकते सिसकते उसने ये बात बताई
पहले तो हर दिल पर मैं करती थी राज
क्या कहूँ ...
बच्चों के दिल में भी नही रही आज
इतने में दया सम्मान और लज्जा भी बोले
जबसे जमने की बदली है चाल
हमरा भी है यही हाल

धीरे धीरे चाहत ने भी दिल खोला
प्रेम, प्रीत, प्रणय, स्नेह
ऐसे कई शब्दों की तरफ से बोला
यूँ तो हर दिल में हम रहते हैं
मतलब नज़र आए तो झरने से बहते हैं
स्वार्थ की आड़ में अक्सर हमारा प्रयोग होता है
ऐसे हालात देख कर दिल बहुत रोता है

तभी चुपचाप बैठे स्वाभिमान ने हुंकारा
पौरुष, हिम्मत और जोश को पुकारा
सब की आँखों में आ गये आँसू
मिल कर अपने अस्तित्व को धितकारा

तभी कायरता ने दी सलाह
बोली काट दो अपने अपने पंख
नही तो देर सवेर सब मर जाओगे
शब्द कोष की वीथियों में नज़र भी नही आओगे

इतने में गुंडागर्दि और मक्कारी मुस्कुराए
शोरशराबे के साथ बीच सभा में आए
बोले हमारे देव झूठ का है ज़माना
तुम शब्दकोष से बाहर मत आना

इंसानों के बीच हमारा है बोलबाला
वो देखो सत्य का मुँह काला

ये सुनते ही इंसानियत घबराई
करुणा के दिल में दहशत छाई
चाहत ने गुहार लगाई
स्वाभिमान ने टाँग उठाई
सब की आत्मा
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