गुरुवार, 19 अगस्त 2010

मैं नही चाहता ...

नही मैं नही चाहता
नीले आकाश को छूना
नयी बुलंदी को पाना
उस गगनचुंबी इमारत में बैठना
जहाँ धुएं का विस्तार खुद को समेटने नही देता
जहाँ हर दूसरा तारा
तेज़ चमकने कि होड़ में लुप्त हो जाता है
पैर टिकाने कि कोशिश में
दूसरे का सिर कुचल जाता है

जहाँ सिक्कों का शोर बहरा कर दे
खुद का अस्तित्व बोना हो जाए
संवेदनहीन दीवारों में धड़कन खो जाए

तेरे हाथों की खुश्बू
" सिक्योरिटी चैक" कर के आए
अम्मा के हाथों से बनी रोटी
पिज़्ज़ा बर्गर से शरमाये

जहाँ अंतस का चुंबकीय तेज महत्व हीन हो जाए
बचपन की यादों पर पहरा लग जाए
टुकड़ों में बँटा मेरा अस्तित्व
कोट और पैंट में फँस जाए

मैं नही चाहता
हाँ मैं नही चाहता
उस नीले आकाश को छूना
नयी बुलंदी को पाना
उस गगनचुंबी इमारत में बैठना