सोमवार, 13 सितंबर 2010

बीती यादें ...

अक्सर
गुज़रे हुवे वक़्त की सतह पर
तेरी यादों की काई टिकने नही देती
एक बार फिसलने पर
फिसलता चला जाता हूँ
खुद को समेटने की कोशिश में
और बिखर जाता हूँ
बीते लम्हों के घाव
पूरे जिस्म पर उभर आते हैं

बीती यादों का जंगल
निकलने नही देता है
वर्तमान में जीने की कोशिश
तेरा ख्वाब रोक देता है
उंगलियों की पकड़
मौका पकड़ने नही देती
बाहों में कोई ख्वाब
जकड़ने नही देती

घर की हर चौखट पर
तेरी यादों की दीमक रेंग रही हैं
बीते लम्हों की सीलन
दीवारों पर उतर आई है

अगली बरसात से पहले
हर कमरे को धूप लगाना चाहता हूँ
बरसों से जमी काई
खुरच देना चाहता हूँ
हर साल की तरह अपने आप से
नया अनुबंध करना चाहता हूँ
इक नया ख्वाब बुनना चाहता हूँ