बुधवार, 29 सितम्बर 2010

उफ़ .... तुम भी न

पता है
तुमसे रिश्ता ख़त्म होने के बाद
कितना हल्का महसूस कर रहा हूँ

सलीके से रहना
ज़ोर से बात न करना
चैहरे पर जबरन मुस्कान रखना
"सॉरी"
"एसक्यूस मी"
भारी भरकम संबोधन से बात करना
"शेव बनाओ"
छुट्टी है तो क्या ...
"नहाओ"
कितना कचरा फैलाते हो
बिना प्रैस कपड़े पहन लेते हो

धीमे बोलने के बावजूद
नश्तर सी चुभती तुम्हारी बातें
बनावटी जीवन की मजबूरी
अच्छे बने रहने का आवरण

उफ्फ ... कितना बोना सा लगने लगा था

अच्छा ही हुआ डोर टूट गई

कितना मुक्त हूँ अब

घर में लगी हर तस्वीर बदल दी है मैने
सोफे की पोज़ीशन भी बदल डाली

फिल्मी गानों के शोर में
अब देर तक थिरकता हूँ
ऊबड़-खाबड़ दाडी में
जीन पहने रहता हूँ

तुम्हारे परफ्यूम की तमाम शीशियाँ
गली में बाँट तो दीं

पर क्या करूँ
वो खुश्बू मेरे ज़हन से नही जा रही

और हाँ
वो धानी चुनरी
जिसे तुम दिल से लगा कर रखती थीं
उसी दिन से
घर के दरवाजे पर टाँग रक्खी है
पर कोई कम्बख़्त
उसको भी नही ले जा रहा ....

95 टिप्पणियाँ:

अनिल कान्त ने कहा…

क्या साहब ....क्या लिखते हैं आप

वन्दना ने कहा…

भावों को , बेचैनी को जिस खूबसूरती से बांधा है उसके क्या कहने…………………सच कुछ चीजें कभी जुदा नही हो सकतीं चाहे ज़ेहन से कितना ही यादों को खुरच खुरच कर निकाल दो फिर भी अपना आभास कराती ही रहती हैं।

Majaal ने कहा…

सच्चे न हो तो , झूठे वादें ही सहीं,
तू न सही, तो तेरी यादें ही सहीं,
ब्लॉग सहीं, डायरी ही सहीं,
कविता सही, शायरी ही सहीं ...

भावनाओं की उम्दा अभिव्यक्ति .. लिखते रहिये ...

संगीता पुरी ने कहा…

बहुत सुंदर ..

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…

आदरणीय बंधुवर दिगम्बर नासवा जी
नमस्कार !
पूरी कविता दो दफ़ा पढ़ लेने के बाद मन यही बोला -
उफ़ … तुम भी न !

… साथ ही ईश्वर से आपके सुखमय जीवन के लिए लिए बहुत बहुत प्रार्थना है ।
भाईजान , आपकी छवि ग़ज़लकार की स्थापित है मन में । अगली पोस्ट में ग़ज़ल का इंतज़ार रहेगा , और मैं जानता हूं आप निराश किसी को करते ही नहीं ।

हार्दिक शुभकामनाओं सहित
- राजेन्द्र स्वर्णकार

संजय भास्कर ने कहा…

आदरणीय दिगम्बर नासवा जी
नमस्कार !

बहुत अच्छी प्रस्तुति संवेदनशील हृदयस्पर्शी मन के भावों को बहुत गहराई से लिखा है

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

और हाँ
वो धानी चुनरी
जिसे तुम दिल से लगा कर रखती थीं
उसी दिन से
घर के दरवाजे पर टाँग रक्खी है
पर कोई कम्बख़्त
उसको भी नही ले जा रहा ....

नासवा साहब,उफ़ … तुम भी न ! बहुत सुंदर !!

Apanatva ने कहा…

are bandhu ye kya likh dala .........
apane hee to toka takee karte hai office me boss thodee na kahegaki shave badee hai ....ya kapde kaise pahine ho...?

kalpana me bhee koi vytha jindgee se naa jude isee aasheesh ke sath............

Shekhar Suman ने कहा…

वाह नासवा जी क्या लिखा है आपने...
मज़ा ही आ गया पढ़कर....
मेरी नयी कविता पर अपनी बहुमूल्य टिप्पणी के लिए धन्यवाद...

arvind ने कहा…

bahut badhiya kavita....badhai.

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

वाह !
नाज़ुक जज़्बात की ख़ूबसूरत अक्कासी


धीमे बोलने के बावजूद
नश्तर सी चुभती तुम्हारी बातें
बनावटी जीवन की मजबूरी
अच्छे बने रहने का आवरण

क्या बात है!

निर्मला कपिला ने कहा…

तुम्हारे परफ्यूम की तमाम शीशियाँ
गली में बाँट तो दीं

पर क्या करूँ
वो खुश्बू मेरे ज़हन से नही जा रही
बहुत खूब ! बहुत अच्छी लगी रचना। केवल यही कहूँगी। शुभकामनाये।

shikha varshney ने कहा…

माशाल्लाह क्या लिखा है ...एक एक अहसास पूरी तरह उकेरा हुआ है.

ashish ने कहा…

वाह , खूबसूरत चित्रण , पता नहीं क्यू मुझे ये कविता पढ़कर उपेन्द्र नाथ अश्क की एकांकी तौलिये याद आ गयी .

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

uss ghani chunri ko koi nahi le jaa rah hai........

uff!! itne pyare shabdo me dard ko bhi dikhaya ja sakta hai......:)

sada ने कहा…

धीमे बोलने के बावजूद
नश्तर सी चुभती तुम्हारी बातें
बनावटी जीवन की मजबूरी
अच्छे बने रहने का आवरण

बहुत ही सुन्‍दरता से व्‍यक्‍त किया है आपने दिल में उठे हर ख्‍याल को, यादों को इतनी से आसानी से अलग करना आसां नहीं, खूबसूरत अभिव्‍यक्ति

कविता रावत ने कहा…

पता है
तुमसे रिश्ता ख़त्म होने के बाद
कितना हल्का महसूस कर रहा हूँ
और
धीमे बोलने के बावजूद
नश्तर सी चुभती तुम्हारी बातें
बनावटी जीवन की मजबूरी
अच्छे बने रहने का आवरण
उफ्फ ... कितना बोना सा लगने लगा था
अच्छा ही हुआ डोर टूट गई
...रिश्तों की कच्ची डोर एक न एक दिन टूट ही जाती है ...फिर भी एक आह, अफ़सोस हमेशा के लिए हमारे हिस्से में आ ही जाती है ... रिश्तो कें बनते बिगड़ते आयाम को बखूबी उकेरा है आपने ............

seema gupta ने कहा…

पता है
तुमसे रिश्ता ख़त्म होने के बाद
कितना हल्का महसूस कर रहा हूँ
" हल्केपन के एहसास की अभिव्यक्ति इन पंक्तियों (और हाँ
वो धानी चुनरी )तक आते आते जाने कितनी भारी हो चली है...." इतनी की एक टीस सी उठती है मन में की क्या ये धानी चुनरी हल्केपन के एहसास को सह पाएगी ......" बेहतरीन...
regards

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

और हाँ
वो धानी चुनरी
जिसे तुम दिल से लगा कर रखती थीं
उसी दिन से
घर के दरवाजे पर टाँग रक्खी है
पर कोई कम्बख़्त
उसको भी नही ले जा रहा ....
--
---
वाह..वाह...!
नासवा जी!
बहुत ही मार्मिक चित्र खींचा है आपने!

वीना ने कहा…

तुम्हारे परफ्यूम की तमाम शीशियाँ
गली में बाँट तो दीं

पर क्या करूँ
वो खुश्बू मेरे ज़हन से नही जा रही
बहुत सुंदर

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

लाजवाब नज़्म है नासवा जी...
बंधनों से मुक्ति के बावजूद...
”पर क्या करूँ
वो खुश्बू मेरे ज़हन से नही जा रही”
सच कहा है...
वो वसीम बरेलवी साहब का शेर है न-
जो एक बोझ था इक शाम जब नहीं लौटा
उसी परिन्दे का शाख़ों ने इंतज़ार किया.

M VERMA ने कहा…

रिश्तों की अपनी खुश्बू होती है ..
एहसासों के लिये दरवाजे मायने नहीं रखते वे अपना असर दिखाते ही हैं
तसव्वुर का वह रंग कहाँ बिखेरा जा सकता है.
हवाओं की फुसफुसाहट को कौन रोक सकता है.
हर अनछुए स्पर्श जब कुहराम करेंगे तब ....

क्या खूब लिखा है

डॉ टी एस दराल ने कहा…

नासवा जी , ये पंक्तियाँ दिल से निकली हों , या दिमाग से --हैं बहुत खूबसूरत ।
ऐसा मूढ़ कैसे बना लेते हैं आप ?
शानदार रचना ।

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

और हाँ
वो धानी चुनरी
जिसे तुम दिल से लगा कर रखती थीं
उसी दिन से
घर के दरवाजे पर टाँग रक्खी है
पर कोई कम्बख़्त
उसको भी नही ले जा रहा ....
बहुत सुन्दर लिखा है . किस किस से पीछा छुडायेंगे.

Udan Tashtari ने कहा…

ओह! अहसास तरलता के साथ उतर गये सीधे दिल में...शानदार!

रचना दीक्षित ने कहा…

ये उफ्फ्फ ही तो है जो दिल में चुभती रहती है और यादें तो जैसे कभी न जाने के लिए ही आती है भाव पूर्ण हृदयस्पर्शी प्रस्तुति

Sonal Rastogi ने कहा…

उफ़ विरह के रंग ,इतनी प्यारी रचना ..कई बार पढनी पड़ेगी

सम्वेदना के स्वर ने कहा…

दिगम्बर जी,
आज आपकी कविता पर दो शेर मेरी तरफ से, क्योंकि मेरे पास लफ्ज़ नहीं..ये जो आपने बड़ी आसानी से कह दिया कि हल्का महसूस कर रहे हैं, दरअस्ल कितना बनावटी है कि बस यही कहने को जी चाहता हैः
तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो, क्या ग़म है जिसको छिपा रहे हो. (क़ैफ़ी आज़मी)
शगुफ्ता लोग भी टूटे हुए होते हैं अंदर से,
बहुत रोते हैं वो जिनको लतीफ़े याद रहते हैं. (मुनव्वर राना)

dhiru singh {धीरू सिंह} ने कहा…

मेरे कहने को तो कुछ रह ही नही गया .
लेकिन आपका यह कलाम भी कमाल है

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

बहुत अच्छी कविता है.... क्योंकि दिल और ज़ेहन में बसे अहसास कहाँ छोड़ते हैं इन्सान को.......... उम्दा पंक्तियाँ

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

नायाब... सुंदरतम रचना.

रामराम

Arvind Mishra ने कहा…

बेजोड़ रचना !

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने कहा…

उफ्फ ... कितना बोना सा लगने लगा था

अच्छा ही हुआ डोर टूट गई

कितना मुक्त हूँ अब ..
--- यह सच है ! भाव-विशेष के आग्रह में हम तदाकार जीवन जीते हैं ! यही उस क्षण का सुख होता है और उत्तरवर्ती जीवन में एक दुःख भी !

कविता का अंत सुन्दर है ! आभार !

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

तुम्हारे परफ्यूम की तमाम शीशियाँ
गली में बाँट तो दीं
पर क्या करूँ
वो खुश्बू मेरे ज़हन से नही जा रही..
........
रिश्तों की खुश्बू यूँ नहीं जाती
जब तलक रहती है
हम कहते हैं
तू क्यों नहीं चली जाती!
........
..सुंदर अभिव्यक्ति.

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

तुम्हारे परफ्यूम की तमाम शीशियाँ
गली में बाँट तो दीं
पर क्या करूँ
वो खुश्बू मेरे ज़हन से नही जा रही..
........
रिश्तों की खुश्बू यूँ नहीं जाती
जब तलक रहती है
हम कहते हैं
तू क्यों नहीं चली जाती!
........
..सुंदर अभिव्यक्ति.

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सब कुछ ठीक होने पर यह तड़प क्यों रह रह कर हूक सी उठती है।

'उदय' ने कहा…

... बहुत सुन्दर ... बेहतरीन !!!

Parul ने कहा…

jindagi ki tis kya khoob ukera hai aapne...

रश्मि प्रभा... ने कहा…

पर क्या करूँ
वो खुश्बू मेरे ज़हन से नही जा रही
waah

kshama ने कहा…

Mujhe samajh me nahi aa raha ki,tippanee ke liye kin shabdon ka istemaal karun....bas,rachana lajawaab hai,itnahi kah paa rahee hun!

राज भाटिय़ा ने कहा…

सुंदर यादो को आप ने कविता का रुप्दे दिया, बहुत भाव भरे एहसास. धन्यवाद

सुमन'मीत' ने कहा…

बहुत सुन्दर..............

महफूज़ अली ने कहा…

दिगंबर जी.... क्या लिखते हैं आप...... एकदम बाँध लेते हैं और आपकी रचनाएँ दिल को छू लेतीं हैं.....

ali ने कहा…

जेहन की खुशबू सलामत रहे और आपके 'की बोर्ड' के रास्ते हर्फ़ दर हर्फ़ बिखरती रहे !

मनोज कुमार ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
देसिल बयना-नदी में नदी एक सुरसरी और सब डबरे, करण समस्तीपुरी की लेखनी से, “मनोज” पर, पढिए!

शरद कोकास ने कहा…

कितनी सहज कविता है ।

'अदा' ने कहा…

ये यादें किसी दिलोजानम के चले जाने के बाद आती हैं...
यादें..यादें..यादें...
बहुत खूबसरती से अपने अहसास आपने पिरोये हैं...

Gourav Agrawal ने कहा…

बेहद जटिल भावनाओ को कितनी आसानी से शब्दों में बाँधा है .. अद्भुद

Mrs. Asha Joglekar ने कहा…

Kitana bhee main samaza loon dil ko too chali gaee achcha he hua.
Par in yadon ka kya kroon jinhe tera jana chubhana hee hua.

kitana sunder likah hai aapne.

मो सम कौन ? ने कहा…

काश, ये सच भी होता...
जगजीत सिंह की गाई गज़ल भी याद आती है - मेरी तरह तुम भी झूठे हो..

राजभाषा हिंदी ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति। भारतीय एकता के लक्ष्य का साधन हिंदी भाषा का प्रचार है!
मध्यकालीन भारत धार्मिक सहनशीलता का काल, मनोज कुमार,द्वारा राजभाषा पर पधारें

विरेन्द्र सिंह चौहान ने कहा…

पर क्या करूँ
वो खुश्बू मेरे ज़हन से नही जा रही.

परफ्यूम की शीशियाँ तो बाँट दी
लेकिन उस खुशबु को .........

यही तो बात है सर जी !!!!!

बहुत ही उम्दा लिखा है आपने .
पढ़कर बहुत अच्छा लगा .

आभार .

Archana ने कहा…

मन नहीं मानता,
अब भी तुम कितना याद आते हो
सुबह जल्दी आँख का खुल जाना
ये तुम्हारी आदत थी,उस समय
आज भी नींद जल्दी खुल जाती है
हाथ आज भी सिरहाने
उन बालों को टटोलता है
जो कभी मेरी उंगलियों से
फ़िसल जाया करते थे
उठ कर चुप बैठ जाती हूँ
सुबह का इंतजार करते हुए
बच्चे बडे हो गए तो
न स्कूल,न टिफ़ीन
और तुम भी नहीं
तो नाश्ते का भी कोई समय नहीं
वैसे भी गले नहीं उतरता
दिल में छेद हो गया है
बहुत दर्द होता है
हूक सी उठती है
पर किसी से कुछ कह भी नहीं पाती
और कहूँ भी तो किससे?
सुनने वाला कौन है यहाँ
उफ़.....तुम भी न...

शिवम् मिश्रा ने कहा…


बेहतरीन पोस्ट लेखन के बधाई !

आशा है कि अपने सार्थक लेखन से,आप इसी तरह, ब्लाग जगत को समृद्ध करेंगे।

आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है-पधारें

सुज्ञ ने कहा…

स्वतंत्रता और मोह-बंधन की उल्झन!!
सुंदर,अतिसुंदर भाव-निरुपण!!

psingh ने कहा…

naswa ji
jordar rachna

शोभना चौरे ने कहा…

itna bhi asan nahi hai use bhula dena
jis tarh sofe ko apni jgh se hta dena .
kabhi kabhi bathroom ki dival par chipki bidi bhi kask de jayegi ?

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

पर क्या करूँ
वो खुश्बू मेरे ज़हन से नही जा रही
जिन सारी बातों से परेशान नज़र आते थे आज वही बातें याद करके परेशान हैं ..

भावनाओं को गहराई से लिखा है

रंजीत/ Ranjit ने कहा…

और हाँ
वो धानी चुनरी
जिसे तुम दिल से लगा कर रखती थीं
उसी दिन से
घर के दरवाजे पर टाँग रक्खी है
पर कोई कम्बख़्त
उसको भी नही ले जा रहा .


in reshmee yadon me kitna dard hai. sochta hun is kavi k bare me aksar, kitne nimdard hai inke sine me....

ajit gupta ने कहा…

बेतरतीब जीवन रास आता है
तुम्‍हारे अवरोधों से तंग आ गया हूँ
दुनिया की शुरुआत में खड़ा मनु
कभी श्रद्धा को और कभी इड़ा को याद करता है।

RAJWANT RAJ ने कहा…

swal ye hai ki vo dhani chunri abtlk aapke drwaje pe tngi kyon hai ?kisi ko apni jindgi se rukhsat krna hai puri trha to kisi teesre ke share ki kya jrurat? khi ye khud se playn to nhi , aapko smjhne ke liye aapki pichhli any post bhi pdungi .
thanks

RAJWANT RAJ ने कहा…

swal ye hai ki vo dhani chunri abtlk aapke drwaje pe tngi kyon hai ?kisi ko apni jindgi se rukhsat krna hai puri trha to kisi teesre ke share ki kya jrurat? khi ye khud se playn to nhi , aapko smjhne ke liye aapki pichhli any post bhi pdungi .
thanks

रंजना ने कहा…

आपकी अभिव्यक्ति....ओह,क्या कहूँ....

मनोज कुमार ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
चक्रव्यूह से आगे, आंच पर अनुपमा पाठक की कविता की समीक्षा, आचार्य परशुराम राय, द्वारा “मनोज” पर, पढिए!

rashmi ravija ने कहा…

पर क्या करूँ
वो खुश्बू मेरे ज़हन से नही जा रही

बस यही तो बात है....
ये ही अहसास तो रिश्ते को जिलाए रखते हैं...बहुत ही ख़ूबसूरत कविता .

rashmi ravija ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
rashmi ravija ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
rashmi ravija ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
सतीश सक्सेना ने कहा…

बेहद मार्मिक है यार....यह क्या लिख दिया आपने नासवा जी ....??

ZEAL ने कहा…

.

यादें तो साथ ही रहती हैं...वो खनक...वो खुशबू ...और वो धानी रंग....

.

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

बस कुछ भी कर लो...लेकिन ये यादे....इनको निकालना इतना आसान नहीं...

सुंदर शब्द दिए एहसासों को.

ज्योति सिंह ने कहा…

धीमे बोलने के बावजूद
नश्तर सी चुभती तुम्हारी बातें
बनावटी जीवन की मजबूरी
अच्छे बने रहने का आवरण

उफ्फ ... कितना बोना सा लगने लगा था

अच्छा ही हुआ डोर टूट गई

कितना मुक्त हूँ अब
rachna bahut khoobsurat .kabhi kabhi inki aadat pad jaati aur juda hone par ek kami mahsoos hoti hai .

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा…

वाकई कमाल की रचना....कितनी भावनाएं समेट रखी हैं आपने इस कविता मे.....

स्वप्निल कुमार 'आतिश' ने कहा…

bahut hi nazuk ehsaas samete hai yah nazm ... behad achhi lagi

BrijmohanShrivastava ने कहा…

पढ कर एक गाना गाने का मन कर रहा है ’’तुम मुझे यूं भुला न पाओगे ’’ और दूसरा गाना ’’ तू जहां जहा चलेगा मेरा साया साथ होगा ’’फिर क्याा करोगे

Mumukshh Ki Rachanain ने कहा…

सब कुछ ठीक होने पर यह तड़प क्यों रह रह कर हूक सी उठती है।
दिल की बात ब्लाग पर ला कहीं कुछ गलती तो नहीं कर दी की असल जिंदगी भी.........
कहीं कुछ तो बात है, सब कुछ ठीक ठाक तो है न ........
चन्द्र मोहन गुप्त

Prem Farrukhabadi ने कहा…

aapki rachna ek saans mein hi padh gaya. likhte likhte ruk kyon gaye likhte jate ........... badhai!!

गिरीश बिल्लोरे ने कहा…

वियोग की प्रतिमूर्ति उर्मिला का तापसी जीवन सीता की पीर से भी बढ़कर था पर उर्मिला की तपस्या को कम ही कवि समझ पाए ... मेरी पूज्य पात्र है उर्मिला तापसी को प्रणाम

आशीष/ ਆਸ਼ੀਸ਼ / ASHISH ने कहा…

बाऊ जी,
नमस्ते!
मुझे तो पहले-पहल लगा, 'चलो अच्छा हुआ मुक्ति मिली'!
टंटा कटा! जियो बिंदास! खुल के!
फिर मालूम हुआ, कमी भी खल ही रही है!
स्वाद आ गया!
आशीष

Dr.Bhawna ने कहा…

Bahut khub ..chaliye shanti se rahna to mila...

Dr.Bhawna ने कहा…
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हरकीरत ' हीर' ने कहा…

जहां अपना अस्तित्व खत्म होता नज़र आये दुविधाओं के बीच जीने से अच्छा है कोई एक फैसला ले लिया जाये ....
नहीं जानती ये ज़िन्दगी की सच्चाई है या महज़ एक कविता ......
बहरहाल आपने शब्दों को खूब बांधा वो भी दिल से .....
फैसला आपका है धानी चुनरिया को पार्सल कर उसे भेज दें या दिल से लगा रखें .....!!

Babli ने कहा…

बहुत सुन्दर और शानदार रचना प्रस्तुत किया है आपने ! बधाई!

aarya ने कहा…

भाई जी !
मार के रख दिया आपने !
रत्नेश त्रिपाठी

डॉ महेश सिन्हा ने कहा…

वो धानी चुनरी
जिसे तुम दिल से लगा कर रखती थीं
उसी दिन से
घर के दरवाजे पर टाँग रक्खी है
पर कोई कम्बख़्त
उसको भी नही ले जा रहा ..

वाह

Shekhar Suman ने कहा…

मेरे ब्लॉग पर इस बार ....
क्या बांटना चाहेंगे हमसे आपकी रचनायें...
अपनी टिप्पणी ज़रूर दें...
http://i555.blogspot.com/2010/10/blog-post_04.html

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…

बहुत सुन्दर ... बहुत ही बेहतरीन तरीके से आपने कविता में मोड़ लाए हैं ...

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

दिगंबर जी, क्या कहूँ आज की प्रस्तुति की दिल छू लेनी वाली रचना है...सच में अगर ऐसे बंधन से कोई मुक्त होता होगा तो उसे कैसा लगता होगा...स्वतंत्र जीवन बिताना और खुश रहना एक बड़ी बात है और कोई भी अगर उस स्वतंत्रता में बाधक बनता है तो अच्छा नही लगता....बहुत बढ़िया ढंग से प्रस्तुत किया आपने और अंतिम चुनरी वाली कड़ी तो और भी बेहतरीन है...बहुत बहुत बधाई दिगंबर भैया....प्रणाम

boletobindas ने कहा…

'घर में लगी हर तस्वीर बदल दी है मैने'

मुझे फिर से लगा कि सारे खत फाड़ डाले हैं मैने।

'सोफे की पोज़ीशन भी बदल डाली'
मैने तो देखने का एंगल ही बदल डाला था। फिर लगा कि क्यों भई...............अपनी तो ऐसे ही सही है..

योगेन्द्र मौदगिल ने कहा…

wah digambar ji wah......

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

कमाल की रचना है ..बहुत बहुत पसंद आई यह ..शुक्रिया

hempandey ने कहा…

तुमसे रिश्ता ख़त्म होने के बाद
कितना हल्का महसूस कर रहा हूँ

- कविता की एक एक पंक्ति इस झूठ को उजागर कर रही है | सुन्दर रचना |

मंजुला ने कहा…

धीमे बोलने के बावजूद
नश्तर सी चुभती तुम्हारी बातें
बनावटी जीवन की मजबूरी
अच्छे बने रहने का आवरण


bahut bahut aacha likhtey hai aap ........

Priyanka Soni ने कहा…

लाजवाब ! अद्भुत !
मन प्रसन्न हो गया.

इंदु पुरी ने कहा…

उफ़! केवल कविता है या सच है?मैं हत्भ्रत हूँ.