मंगलवार, 26 अक्तूबर 2010

कहने को दिल वाले हैं ...

गुरुदेव पंकज जी के आशीर्वाद से इस ग़ज़ल में कुछ परिवर्तन किए हैं .... ग़ज़ल बहर में आ गयी है अब ... आशा है आपको पसंद आएगी .....

छीने हुवे निवाले हैं
कहने को दिल वाले हैं

जिसने दुर्गम पथ नापे
पग में उसके छाले हैं

अक्षर की सेवा करते
रोटी के फिर लाले हैं

खादी की चादर पीछे
बरछी चाकू भाले हैं

जितने उजले कपड़े हैं
मन के उतने काले हैं

न्‍योता जो दे आए थे
घर पर उनके ताले हैं

कौन दिशा से हवा चली
बस मदिरा के प्याले हैं