मंगलवार, 20 जुलाई 2010

जांना ...

जांना ..
सुन मेरी जांना ..

अक्सर तेरे स्पर्श के बाद
में जाग नही पाता
और सच पूछो
तो सो भी नही पाता

सोया होता हूँ
तो चेतन रहता हूँ
चेतन में सम्मोहित रहता हूँ

तेरि मोहिनी
मुझे पाश में लिए रहती है

साँसों के साथ तेरी खुश्बू
मेरे जिस्म में समा जाती है
जब कभी मैं स्वयं से
स्वयं का परिचय पूछता हूँ
तू चुपके से मेरे सामने आ जाती है...

गुरुवार, 15 जुलाई 2010

धरती

परंपराओं में बँधी
दधीचि सी उदार
नियमों में बँधी
जिस्मानी उर्वारा ढोने को लाचार
बेबस धरती की कोख

ना चाहते हुवे
कायर आवारा बीज को
पनाह की मजबूरी
अनवरत सींचने की कुंठा
निर्माण का बोझ
पालने का त्रास

अथाह पीड़ा में
जन्म देने की लाचारी
अनचाही श्रीष्टि का निर्माण
आजन्म यंत्रणा का अभिशाप

ये कैसा न्याय कैसा स्रजन
प्राकृति का कैसा खेल
धरती का कैसा धर्म ....

बुधवार, 7 जुलाई 2010

आवारा यादें ...

खोखले जिस्म में साँस लेतीं
कुछ ज़ख्मी यादें
कुछ लहुलुहान ख्वाब
जागती करवटों में गुज़री अधूरी रातें
जिस्म की ठंडक से चटके लम्हे
पसीने से नहाई चादर में लिपटा सन्नाटों का शोर

कुछ उबलते शब्दों की अंतहीन बहस
खून से रंगी चूड़ियों कि किरचें
कमीज़ पर पड़े कुछ ताज़ा जख्म के निशान

दिल के किसी कोने में
धूल के नीचे दबी
आवारा देह कि मादक गंध
कुछ हसीन लम्हों की तपिश
महकते लोबान का अधूरा नशा
गर्म साँसों का पिघलता लावा

उम्र के ढलते पड़ाव पर
कुछ ऐसे लम्हों के भूत
चुड़ेली यादें
जिस्म के खंडहर में जवान होती हैं
वक़्त के हाथों मरहम लगे जख्म कुरेदती हैं
ताज़ा तरीन रखती हैं

शुरू होता है न ख़त्म होने वाला
लंबे दर्द का सिलसिला
पर अब दर्द में
दर्द का एहसास नही होता ...