गुरुवार, 21 अप्रैल 2011

छुप गया जो चाँद

दिल ही दिल में आपका ख्याल रह गया
मिल न पाए फिर कभी मलाल रह गया

था अबीर वादियों में तुम नहीं मिले
मुट्ठियों में बंद वो गुलाल रह गया

इक हसीन हादसे का मैं शिकार हूँ
फिर किसी का रेशमी रुमाल रह गया

देख कर मेरी तरफ तो कुछ कहा नहीं
मुस्कुरा के चल दिए सवाल रह गया

छत न मिल सकी मुझे तो कोई गम नहीं
आसमाँ मेरे लिए विशाल रह गया

आप आ गए थे भूल से कभी इधर
वादियों में आपका जमाल रह गया

इस शेर में शुतुरगुर्बा का ऐब बन रहा था जिसका मुझे ज्ञान नहीं था ... गुरुदेव पंकज ने बहुत ही सहजता से इस दोष को दूर कर दिया ... पहले ये शेर इस प्रकार था ...
(आ गए थे तुम कभी जो भूल से इधर
वादियों में आपका जमाल रह गया)
गुरुदेव का धन्यवाद ...

छुप गया जो चाँद दिन निकल के आ गया
आ न पाए वो शबे विसाल रह गया