सोमवार, 20 जून 2011

रिश्ता ...

(गुरुदेव पंकज जी के सुझाव पर तुम और तू के दोष को दूर करने के बाद)

जिस दिन
हमारे रिश्ते की अकाल मृत्यु हुई
कुकुरमुत्ते की तरह तुम्हारी यादें
सर उठाने लगीं

कंबल में जमी धूल सी तुम
तमाम कोशिशों के बावजूद
झाड़ी नही गयीं मुझसे
सफेदी की अनगिनत परतों के बाद भी घर की दीवारें
तुम्हारी यादों के मकड़-जाल से अटी पड़ी हैं
बारिश में उतरी सीलन सी तुम्हारी गंध
घर के कोने कोने में बस गयी है
यादों की धूल
वेक्युम चलाने के बावजूद
शाम होते होते
जाने कौन सी खिड़की से चुपचाप चली आती है
केतली से उठती भाप के साथ
हर सुबह तुम मेरे नथुनों में घुसने लगती हो
जब कभी आईना देखता हूँ
बालों में उंगलियाँ फेरने लगती हो
सॉफ करने पर भी
पुरानी गर्द की तरह
आईने से चिपकी रहती हो
घर के कोने कोने में तुम्हारी याद
चींटियों की तरह घूमने लगी है
स्मृतियों की धूल
कब जूतों के साथ घर आ जाती है
पता नही चलता

मैं जानता हूँ
इस रिश्ते की तो अकाल मृत्यु हो चुकी है
और यादों की धूल भी समय के साथ बैठ जाएगी
पर नासूर बने ये जख्म
क्या कभी भर पाएंगे

81 टिप्पणियाँ:

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

दोनों लिंक्स पर हो कर आई हूँ ..लेख भी पढ़ लिया है ...

यादें ने कहा…

यादें ऐसी ही होती हैं ...

तुम्हें भुलाना भी ,याद
करने का इक बहाना है |

सदा ने कहा…

यादों के साये में यह अभिव्‍यक्ति .. बेहतरीन ।

वन्दना ने कहा…

यादों का खूबसूरत बिम्बो के माध्यम से प्रयोग किया है ………और कविता तो अपने आप मे बेजोड है।

वीना ने कहा…

बहुत बढ़िया भाव...बहुत सुंदर कविता...

kshama ने कहा…

मैं जानता हूँ
इस रिश्ते की तो अकाल मृत्यु हो चुकी है
और यादों की धूल भी समय के साथ बैठ जाएगी
पर नासूर बने ये जख्म
क्या कभी भर पाएंगे
Yaaden aur rishoton se mile zakhm kuchh aise hee hote hain...

shikha varshney ने कहा…

कविता के भाव दुखपूर्ण हैं. फिर भी ताजगी का एहसास दे गई इसकी वजह है इसमें प्रयुक्त अनूठे बिब्म.
अच्छी लगी अभिव्यक्ति.

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

कंबल में जमी धूल सी तुम
तमाम कोशिशों के बावजूद
झाड़ी नही गयीं मुझसे

रिश्ते भले ही दम तोड़ देन पर यादें खत्म नहीं होतीं ... संवेदनशील रचना ...

अल्पना वर्मा ने कहा…

-सशक्त भाव-अभिव्यक्ति
कुछ रिश्ते शायद कभी भी पूरी तरह बेजान नहीं होते..इसीलिये यादें हमेशा उन्हें किसी न किसी रूप में जिलाए रखने की कोशिश करती रहती हैं..

शालिनी कौशिक ने कहा…

मैं जानता हूँ
इस रिश्ते की तो अकाल मृत्यु हो चुकी है
और यादों की धूल भी समय के साथ बैठ जाएगी
पर नासूर बने ये जख्म
क्या कभी भर पाएंगे
behtareen abhivyakti.

veerubhai ने कहा…

गो कि तुम मेरे वजूद से लिपटी रहती हो ,
जब कभी बाहर तापमान होता है बहुत कम ,
मेरे मुंह से निकली भांप में लकीर बनके आ जाती हो तुम ।
नासवा रिश्ते वजूद से लिपट के रह जातें हैं .बहुत सुनदर रचना ,मानसिक कुन्हासे को शब्दों का पैरहन पहराती सी .

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति!
आप अतुकान्त रचना भी बहुत अच्छी लिखते हैं!

रोहित ने कहा…

BEHAD SUNDAR RACHNA..

मेरे भाव ने कहा…

marmsparshi kavita... dil ko chhu gai

Patali-The-Village ने कहा…

बहुत मार्मिक कविता|

ana ने कहा…

बेहतरीन

kase kahun?by kavita verma ने कहा…

sach kaha hai rishte ki akal mritayu ke bad bhi yade to bani hi rahti hai...behad marmik..

डॉ टी एस दराल ने कहा…

यादों को धूल में मिलाकर बहुत सुन्दर प्रयोग किया है रचना में ।
कुछ यादें कभी नहीं मिटती ।

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

रोज़ तेरी यादों की धूल
वेक्युम चलाने के बावजूद
शाम होते होते
जाने कौन सी खिड़की से चुपचाप चली आती है
केतली से उठती भाप के साथ
हर सुबह तुम मेरे नथुनों में घुसने लगती हो

bhaavo ko darpana dikhane ke liye sashakt shabdo ka chunaav kiya hai. prabhavi rachna.

S.M.HABIB ने कहा…

कंबल में जमी धूल सी तुम
तमाम कोशिशों के बावजूद
झाड़ी नही गयीं मुझसे,,,,
सुन्दर प्रयोग... टीस छोडती सशक्त रचना....
सादर....

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 21 - 06 - 2011
को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

साप्ताहिक काव्य मंच-- 51 ..चर्चा मंच

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

एक अकेली छतरी में जब आधे आधे भीग रहे थे.. दिगंबर जी! आज रूमानियत की गहराइयों तक पहुँची है यह कविता!!

Sonal Rastogi ने कहा…

sach mein kyaa kabhi yaadaein poori tarah dil se jaati hai

Vaanbhatt ने कहा…

अकाल मृत्यु का सदमा ऐसा ही होता है...चाहे वो रिश्ता ही क्यों ना हो...बेहद संजीदा रचना...

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

स्मृतियों से कैसा नाता,
दलदल सा मन धंसता जाता।

dhiru singh {धीरू सिंह} ने कहा…

रिश्तो का पुनर्जन्म भी तो सम्भव है

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

स्मृतियाँ ऐसी ही होती हैं...... बहुत सुंदर कविता

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

दिल को छू रही है, मार्मिक है.

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

दोस्त गमख्वारी मे अब और फरमायेंगे क्या
ज़ख्म के भरने तलक नाखून ने बढ़ जायेंगे क्या।
..मिर्जा गालिब।

Bhushan ने कहा…

यादें तो रहेंगी लेकिन रिश्तों की अकाल मृत्यु के साथ ये तकलीफ देने वाली हैं. भावमयी कविता.

सुमन'मीत' ने कहा…

bhav pooran

Vivek Jain ने कहा…

यादों से भ्री भावमयी कविता,
विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

मैं जानता हूँ
इस रिश्ते की तो अकाल मृत्यु हो चुकी है
और यादों की धूल भी समय के साथ बैठ जाएगी
पर नासूर बने ये जख्म
क्या कभी भर पाएंगे

ek aisa sawal jis ka jawab ham jante to hain lekin manna nahin chahte

रचना दीक्षित ने कहा…

मैं जानता हूँ
इस रिश्ते की तो अकाल मृत्यु हो चुकी है
और यादों की धूल भी समय के साथ बैठ जाएगी
पर नासूर बने ये जख्म
क्या कभी भर पाएंगे.

रिश्ते टूटने की चुभन और यादों के ज्वार भाटे और उसके बाद तूफ़ान के गुजर जाने के बाद की शान्ति. अद्भुत नज़्म सीधे दिल पर गहरा असर छोडती.

आभार.

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत सुंदर कविता.

Sadhana Vaid ने कहा…

बेहद सशक्त रचना ! जिन प्रतिमानों का सहारा लेकर यादें ज़बर्दस्ती घुस आती हैं उनसे पीछा छुड़ाना वाकई नामुमकिन है ! हर पल किसी न किसी रूप में आस पास बनी ही रहती हैं ! मन को गहराई तक छूती बेहतरीन रचना !

विशाल ने कहा…

बहुत ही खूबसूरत भावाव्यक्ति.
सुन्दर शब्द प्रयोग.

विशाल ने कहा…

बहुत ही खूबसूरत भावाव्यक्ति.
सुन्दर शब्द प्रयोग.

udaya veer singh ने कहा…

सारगर्भित शिल्प ,प्रशंसनीय है ,शुक्रिया जी /

ashish ने कहा…

यादों की बारात , भावों की बरसात . सुँदर रचना हो गई आत्मसात .

निर्मला कपिला ने कहा…

वक्त का मरहम सब ज़ख्म भर देता है लेकिन भरे हुये जख्मों से भी कई बार टीस उठती रहती है। भावमय रचना। बधाई।

वाणी गीत ने कहा…

हाथ छूट जाये तो भी रिश्ते नहीं छूटा करते ...
यादें नासूर बन रही हों तो भूलना अच्छा मगर इतना आसान कहाँ ...
तुझे भूल जाने की हर बात से आती है तेरी याद ...

बहुत बढ़िया !

prerna argal ने कहा…

yaadon main doobi bahut sunder bhav liye bemisaal rachanaa.badhaai sweekaren.




please visit my blog.thanks.

कविता रावत ने कहा…

मैं जानता हूँ
इस रिश्ते की तो अकाल मृत्यु हो चुकी है
और यादों की धूल भी समय के साथ बैठ जाएगी
पर नासूर बने ये जख्म
क्या कभी भर पाएंगे
..nassor jakhm vyakt aane par bhar to jaati hai lekin marte kabhi nahi...bahut hi badiya rachna ke liye aabhar!

Anil Pusadkar ने कहा…

अद्भुत,उपमाओं का प्रयोग भी सुन्दर्।

Babli ने कहा…

सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ लाजवाब रचना!

Dr Varsha Singh ने कहा…

बेहतरीन भावपूर्ण रचना के लिए बधाई।

रश्मि प्रभा... ने कहा…

कंबल में जमी धूल सी तुम
तमाम कोशिशों के बावजूद
झाड़ी नही गयीं मुझसे
waah

CS Devendra K Sharma "Man without Brain" ने कहा…

मैं जानता हूँ
इस रिश्ते की तो अकाल मृत्यु हो चुकी है
और यादों की धूल भी समय के साथ बैठ जाएगी
पर नासूर बने ये जख्म
क्या कभी भर पाएंगे

behad dard hai is rachna me...

rishton ki akaal mrityu ke naasur to zindagi bhar nahi bharenge...

magar haan, un par marham laga lagaa kr zindagi kaati ja sakti hai....

waise rishton ki akaal mrityu ke liye jimmedar kaun hai yah prashn hamesha bana rahega......

नश्तरे एहसास ......... ने कहा…

दर्द हमेशा दो तरफ़ा होता है कुछ का शब्दों में लिपट जाता है कुछ का आंसू बन कर बह जाता है........ इस दर्द का एहसास यहाँ तक हुआ.
पर ज़ख्म दोनों को ही गहरे दे जाता है.......बहुत ही भावनात्मक रचना

ehsas ने कहा…

शायद कभी नही। सुन्दर रचना। आभार।

M VERMA ने कहा…

आख़िर हम ऐसा करते ही क्यों है?
रिश्ते अकाल मरते ही क्यों है?

अमिताभ श्रीवास्तव ने कहा…

वाह, फिर वही उपमाओं के साथ खेलने का आनन्द..। दिगम्बरजी, आपकी रचनायें मखमली होती हैं। यादें और रिश्ता आपस में संलग्न होते हैं...जो बैठ जाये भले पर..मिटते नहीं...।

सुन्दर रचना, गुरुवर की कलम लगी हो वो रचना अद्भुत हो ही जाती है।

Dr.Nidhi Tandon ने कहा…

यादों से सजी ....यादों में ढली ....सुन्दर भाव भीनी अभिव्यक्ति

Vivek Jain ने कहा…

मैं जानता हूँ
इस रिश्ते की तो अकाल मृत्यु हो चुकी है
और यादों की धूल भी समय के साथ बैठ जाएगी
पर नासूर बने ये जख्म
क्या कभी भर पाएंगे

बहुत सुंदर कविता
विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

श्यामल सुमन ने कहा…

पर नासूर बने ये जख्म
क्या कभी भर पाएंगे

अवश्य भरेंगे - बस आप यूँ ही लिखते रहिये दिगम्बर भाई - सुन्दर प्रस्तुति

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
http://meraayeena.blogspot.com/
http://maithilbhooshan.blogspot.com/

devendra gautam ने कहा…

ek dard bhari bhaopoorn nazm..achchhi lagi

रंजना ने कहा…

बहुत सुन्दर ढंग से बिम्बों का प्रयोग किया है आपने...

मर्मस्पर्शी बहुत ही सुन्दर कविता...

G.N.SHAW ने कहा…

प्यारी यादे भुलाए नहीं भूलती !

Kailash C Sharma ने कहा…

और यादों की धूल भी समय के साथ बैठ जाएगी
पर नासूर बने ये जख्म
क्या कभी भर पाएंगे..

यादों को कहाँ भुला पाते हैं और उसके दिए ज़ख्म उम्र भर पीड़ा देते रहते हैं..बहुत मर्मस्पर्शी प्रस्तुति..

vandana ने कहा…

कंबल में जमी धूल सी तुम
तमाम कोशिशों के बावजूद
झाड़ी नही गयीं मुझसे
सफेदी की अनगिनत परतों के बाद भी घर की दीवारें
तुम्हारी यादों के मकड़-जाल से अटी पड़ी हैं

जुड़ाव है तो यादें भला कहाँ जायें ऐसे रिश्तों की अकाल मृत्यु नहीं होती

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने कहा…

नए बिम्बों , प्रतिमानों और उपमाओं से सजी सरल,सहज ढंग से संप्रेषित हो रही भाव पूर्ण रचना...

वाह .........गज़ब के भाव,शिल्प और कथ्य

Mrs. Asha Joglekar ने कहा…

आपके बिंब तो.....................कुछ अलघ ही लगे इस बार, कुछ नकारात्मक से, पर मरते रिश्तों मे ऐसा ही होता होगा ।

Navin C. Chaturvedi ने कहा…

यादों की धूल
वेक्युम चलाने के बावजूद
शाम होते होते
जाने कौन सी खिड़की से चुपचाप चली आती है
केतली से उठती भाप के साथ
हर सुबह तुम मेरे नथुनों में घुसने लगती हो


अहहहहह क्या बात है बंधु, जियो प्यारे जियो|

rashmi ravija ने कहा…

बहुत बढ़िया भाव...बहुत सुंदर कविता...

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

सुन्दर रचना! वक़्त से बडा मरहम कहाँ है? समय के साथ जख्म भी भरते हैं और टीस भी मीठी होती है।

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

पहली टिप्पणी भी रोचक है!

निवेदिता ने कहा…

रिश्तों में संवेदनायें जगाती प्रभावी पंक्तियां ....... आभार !

Babli ने कहा…

टिप्पणी देकर प्रोत्साहित करने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया!

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

पुरानी गर्द की तरह
आईने से चिपकी रहती हो
घर के कोने कोने में तुम्हारी याद
चींटियों की तरह घूमने लगी है
स्मृतियों की धूल
कब जूतों के साथ घर आ जाती है
पता नही चलता


नई उपमाओं की सुन्दर कविता के लिए बधाई...

Amrita Tanmay ने कहा…

यादों की धुल को कितना भी दबा दिया जाता है फिर भी एक हल्की हवा भी उसे उड़ाने लगती है और जख्म तो दर्द के लिए ही होता है |सुन्दर कविता |

Suman ने कहा…

यादोंकी यह रिक्तता शायद कभी भरी नहीं जाती !
अच्छी लगी रचना !

Kunwar Kusumesh ने कहा…

नासूर बने ज़ख्म भी भर जायेंगे इक दिन.
दम तोड़ते लम्हात गुज़र जायेंगे इक दिन.

नूतन .. ने कहा…

वाह ...बहुत ही अच्‍छा लिखा है आपने ।

psingh ने कहा…

नसवा जी
एक बार फिर जोरदार रचना
बधाई स्वीकारें

BrijmohanShrivastava ने कहा…

कितनी भी छींटाकसी करलो । व्यंग्य वाण चलालो। जैसे नारद को विष्णु जी ने समझाया था वैसे समझालो, जैसे राम ने सीताहरण के बाद खुद को समझाया वैसे समझालो मगर याद को भूल नहीं सकते ।
नहीं आती जो उनकी याद वरसों तक नहीं आती
मगर जब याद आते है तो अक्सर याद आते है।

वैसे यह सम्बाद किसी पति पत्नि के बीच हो तो हास्य रस

अनिल शर्मा ने कहा…

अति सुन्दर.

इंदु पुरी ने कहा…

नए बिम्बो का प्रयोग..सुन्दर किन्तु दब गई कविता की आत्मा.मैं दूसरों-सी नही जो कह दूँ 'दिल को छू गई रचना'
यादें मीठी हो या कडवी जुड जाती है हमसे और हम उनसे प्यार करने लगते हैं.वर्त्तमान में जीने की सीख देने वाले भी इससे मुक्त नही हो पाए.
खूबसूरत भाव...शब्दों के जाल में यूँ उलझे जैसे बरसों पहले 'केशव' की रचनाये.

प्रतीक माहेश्वरी ने कहा…

वाह यादों और रोज़-मर्रा में होने वाली, सामने आने वाली चीज़ों को क्या खूब एक धागे में पिरोया है.. सुन्दर..

Rakesh Kumar ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति.
मार्मिक और हृदयस्पर्शी भी.
समय सबसे बड़ा मरहम है जो हर जख्म को ठीक कर देता है.

ranjana ने कहा…

nishabd karti rachna....koi bhi shabd chota hai is kavita ki prashansha ke liye...