मंगलवार, 19 जुलाई 2011

अँधेरा ...

तुम्ही ने तो कहा था कितना काला हूँ
अँधेरे में नज़र नहीं आता
साक्षात अँधेरे की तरह

पर क्या तुम्हें एक पल भी
जीवन में अँधेरे का एहसास हुवा

मेरी खुश्क त्वचा ने
कब तुम्हारे अँधेरे को सोखना शुरू किया
मैं नहीं जानता

बढते शिखर के साथ
तुम्हारी जरूरत बढती गयी
मैं और तेजी से जलता रहा
यहाँ तक की आने वाले तमाम रास्तों पर
रौशनी ही रौशनी छितरा दी

अब जबकि तुम्हारी आँखें चुंधियाने लगीं हैं
बढ़ता हुवा रौशनी का दायरा
तुम्हारे साथ चलने लगा है
मैं तुमसे दूर हो रहा हूँ

हाँ ... अँधेरा जो हूँ