बुधवार, 5 अक्तूबर 2011

गोया लुटने की तैयारी ...

मिट्टी का घर मेघ से यारी
गोया लुटने की तैयारी

जी भर के जी लो जीवन को
ना जाने कल किसकी बारी

सागर से गठजोड़ है उनका
कागज़ की है नाव उतारी

प्रजातंत्र का खेल है कैसा
कल था बन्दर आज मदारी

बुद्धीजीवी बोल रहा है
शब्द हैं कितने भारी भारी

धूप ने दाना डाल दिया है
साये निकले बारी बारी

रेगिस्तान में ठोर ठिकाना
ढूंढ रही है धूल बिचारी

जाते जाते रात ये बोली
देखो दिन की दुनियादारी