गुरुवार, 20 अक्तूबर 2011

भूल गये सब लोग दिगंबर आए हैं ...

दुश्मन जब जब घर के अंदर आए हैं
बन कर मेरे दोस्त ही अक्सर आए हैं

तेरे दो आँसू से तन मन भीग गया
रस्ते में तो सात समुंदर आए हैं

गहरे सागर में कितने गोते मारे
अपने हाथों में तो पत्थर आए हैं

भेजे थे कुछ फूल उन्हे गुलदस्ते में
बदले में कुछ प्यासे खंज़र आए हैं

तेरे पहलू में जो हर दम रहते हैं
जाने क्या तकदीर लिखा कर आए हैं

बेच हवेली पुरखों की अब दिल्ली में
मुश्किल से इक कमरा ले कर आए हैं

आँखों आँखों में कुछ उनसे पूछा था
खामोशी में उनके उत्तर आए हैं

ये भी मेरा वो भी मेरा सब मेरा
भूल गये सब लोग दिगंबर आए हैं