गुरुवार, 3 नवंबर 2011

भूल गए जो खून खराबा करते हैं ...

भूल गए जो खून खराबा करते हैं
खून के छींटे अपने पर भी गिरते हैं

दिन में गाली देते हैं जो सूरज को
रात गये वो जुगनू का दम भरते हैं

तेरी राहों में जो फूल बिछाते थे
लोग वो अक्सर मारे मारे फिरते हैं

आग लगा देते हैं दो आंसू पल में
कहने को तो आँखों से ही झरते हैं

उन सड़कों की बात नहीं करता कोई
जिनसे हो कर अक्सर लोग गुज़रते हैं

हाथों को पतवार बना कर निकले जो
सागर में जाने से कब वो डरते हैं

पूजा की थाली है पलकें झुकी हुईं
तुझ पे जाना मुद्दत से हम मरते हैं