मंगलवार, 6 दिसंबर 2011

तेरा वजूद ...

गज़लों के दौर से निकल कर हाजिर हूँ आज कविता के साथ ... आशा है आपको पसंद आएगी ...

अब जबकि हमारे बीच कुछ नही
पता नहीं क्यों तेरी मोहिनी
अब भी मुझे बांधे रखती है

ठुकरा नहीं पाता
तेरी आँखों का मौन आमंत्रण
उन्मादी पहलू का मुक्त निमंत्रण

जबकि कई बार
तेरी धूप की तपिश
अपनी पीठ पे महसूस करने के बावजूद
जेब में नहीं भर सका

तेरे बादलों की बरसात
मुझे भिगोती तो है
पर हर बार उफनती नदी सी तुम
किनारे पे पटक
गंतव्य को निकल जाती हो

मुट्ठी में बंद करने के बावजूद
हाथों की झिर्री से हर बार
चुप-चाप फिसल जाती हो

तेरी मरीचिका में बंधा मेरा वजूद
करीब होकर भी तुझे छू नहीं पाता
तेरी कस्तूरी की तलाश में
कुलांचें मारता हूँ
थकता हूँ गिरता हूँ उठता हूँ
फिर कुलांचें मारता हूँ

हाँ मुझे मालुम है
हमारे बीच कुछ नहीं
पर लगता है ... समझना नहीं चाहता

और वैसे भी क्या पता
साँसों का सिलसिला कब तक रहेगा