मंगलवार, 13 दिसंबर 2011

कमबख्त यादें ...

कई बार
निकाल बाहर किया तेरी यादों को
पर पता नहीं
कौन सा रोशनदान खुला रह जाता है

सुबह की धूप के साथ
झाँकने लगती हो तुम कमरे के अंदर
हवा के ठन्डे झोंके के साथ
सिरहन की तरह दौड़ने लगती हो पूरे जिस्म में

चाय के हर घूँट के साथ
तेरा नशा बढ़ता जाता है

घर की तमाम सीडियों में बजने वाले गीत
तेरी यादों से अटे पड़े हैं
तेज़ संगीत के शोर में भी तुम
मेरे कानों में गुनगुनाने लगती हो

न चाहते हुवे भी एक ही सीडी बजाने लगता हूँ हर बार

तुम्हें याद है न वो गीत
अभी न जाओ छोड़कर .... के दिल अभी भरा नहीं ...

फिल्म हम दोनों ... देव आनंद और साधना ...
उलाहना देती रफ़ी की दिलकश आवाज़ ....

जाने कब नींद आ जाती है रोज की तरह

सो जाता हूँ तेरे एहसास का कम्बल लपेटे ...
हमेशा की तरह ...