सोमवार, 19 दिसंबर 2011

मुक्ति ...

क्या ये सच है
लेखक की कल्पना का कोई अंत नहीं ... ?
कवि की सोच गहरे सागर में गोते लगा कर
सातवें आसमान तक जाती है ... ?

सच लगता है जब श्रोता की तरह सोचता हूँ
पर जब कवि मन से विवाद होता है
अपने आप से आँखें चुराने लगता हूँ

हकीकत में तो
कवि अपनी सोची समझी सोच को
शब्दों की चासनी लपेट कर परोसता है
विशेष विचारधारा का गुलाम
अपने ही फ्रेम में जकड़ा
सोचे हुवे अर्थों के शब्द ढूँढता है
जिसके आवरण में वो सांस ले सके

एक सिमित सा आकाश
जिसमें वो जीता है मरता है
कलाकार होने का दावा करता है
आम आदमी की जमात से ऊपर उठ के
बुद्धिजीवी होने का दावा

सुनो कवि
अपने आप को रिक्त करो
मान्यताएं, विचारधारा
अपनी पसंद के शब्दों का दायरा तोड़ो
ये कारा तोड़ो
सत्य को सत्य की नज़र से देखो
अपने केनवास के किनारे तोड़ो
पसंदीदा रंगों से मोह छोडो
सुना है इतिहास के साक्ष्य कविता में मिलते हैं
तो कवि धर्म निभाओ
अपने आप से मुक्ति पाओ