शनिवार, 30 अप्रैल 2011

ये ऐसा गीत है जिसको सभी ने मिल के गाना है

किसी का घर जलाने की कभी साजिश नहीं करना
जहां हों फूस के छप्पर वहां बारिश नहीं करना

जो पाना है तो खोने के लिए तैयार हो जाओ
जो खोने से है डर पाने की फिर ख्वाहिश नहीं करना

भरोसा गर नहीं होगा तो रिश्ते टूट जायेंगे
किसी को आजमाने की कभी कोशिश नहीं करना

जो खाली हाथ आये हो तो खाली हाथ है जाना
ये मेरा है ये मिल जाए ये फरमाइश नही करना

ये ऐसा गीत है जिसको सभी ने मिल के गाना है
जहर से शब्द कर्कश सी कोई बंदिश नही करना

गुरुवार, 21 अप्रैल 2011

छुप गया जो चाँद

दिल ही दिल में आपका ख्याल रह गया
मिल न पाए फिर कभी मलाल रह गया

था अबीर वादियों में तुम नहीं मिले
मुट्ठियों में बंद वो गुलाल रह गया

इक हसीन हादसे का मैं शिकार हूँ
फिर किसी का रेशमी रुमाल रह गया

देख कर मेरी तरफ तो कुछ कहा नहीं
मुस्कुरा के चल दिए सवाल रह गया

छत न मिल सकी मुझे तो कोई गम नहीं
आसमाँ मेरे लिए विशाल रह गया

आप आ गए थे भूल से कभी इधर
वादियों में आपका जमाल रह गया

इस शेर में शुतुरगुर्बा का ऐब बन रहा था जिसका मुझे ज्ञान नहीं था ... गुरुदेव पंकज ने बहुत ही सहजता से इस दोष को दूर कर दिया ... पहले ये शेर इस प्रकार था ...
(आ गए थे तुम कभी जो भूल से इधर
वादियों में आपका जमाल रह गया)
गुरुदेव का धन्यवाद ...

छुप गया जो चाँद दिन निकल के आ गया
आ न पाए वो शबे विसाल रह गया

सोमवार, 4 अप्रैल 2011

माँ तभी से हो गयी कितनी अकेली

हो गयी तक्सीम अब्बा की हवेली
माँ तभी से हो गयी कितनी अकेली

आज भी आँगन में वो पीपल खड़ा है
पर नही आती है वो कोयल सुरीली

नल खुला रखती है आँगन का हमेशा
सूखती जाती है पर फिर भी चमेली

अनगिनत यादों को आँचल में समेटे
भीगती रहती हैं दो आँखें पनीली

झाड़ती रहती है कमरे को हमेशा
फिर भी आ जाती हैं कुछ यादें हठीली

अब नही करती है वो बातें किसी से
बस पुराना ट्रंक है उसकी सहेली

उम्र के इस दौर में खुद को समझती
काँच के बर्तन में पीतल की पतीली

हो गये हैं अनगिनत तुलसी के गमले
पर है आँगन की ये वृंदा आज पीली