रविवार, 26 जून 2011

मुक्ति ...

स्थिर मन
एकाग्र चिंतन
शांत लहरें
शांत मंथन

आदि न मध्य
अनंत छोर
आत्मा की खोज
अनवरत भोर

श्वांस चक्र
जीवन डोर
अंतिम सफ़र
दक्षिण क्षोर

आत्मा की मुक्ति
निरंतर संग्राम
जीवन संध्या
अंतिम विश्राम

गर्भ से शून्य
शून्य से गर्भ
स्वयं ही बंधन
स्वयं ही मुक्त

सोमवार, 20 जून 2011

रिश्ता ...

(गुरुदेव पंकज जी के सुझाव पर तुम और तू के दोष को दूर करने के बाद)

जिस दिन
हमारे रिश्ते की अकाल मृत्यु हुई
कुकुरमुत्ते की तरह तुम्हारी यादें
सर उठाने लगीं

कंबल में जमी धूल सी तुम
तमाम कोशिशों के बावजूद
झाड़ी नही गयीं मुझसे
सफेदी की अनगिनत परतों के बाद भी घर की दीवारें
तुम्हारी यादों के मकड़-जाल से अटी पड़ी हैं
बारिश में उतरी सीलन सी तुम्हारी गंध
घर के कोने कोने में बस गयी है
यादों की धूल
वेक्युम चलाने के बावजूद
शाम होते होते
जाने कौन सी खिड़की से चुपचाप चली आती है
केतली से उठती भाप के साथ
हर सुबह तुम मेरे नथुनों में घुसने लगती हो
जब कभी आईना देखता हूँ
बालों में उंगलियाँ फेरने लगती हो
सॉफ करने पर भी
पुरानी गर्द की तरह
आईने से चिपकी रहती हो
घर के कोने कोने में तुम्हारी याद
चींटियों की तरह घूमने लगी है
स्मृतियों की धूल
कब जूतों के साथ घर आ जाती है
पता नही चलता

मैं जानता हूँ
इस रिश्ते की तो अकाल मृत्यु हो चुकी है
और यादों की धूल भी समय के साथ बैठ जाएगी
पर नासूर बने ये जख्म
क्या कभी भर पाएंगे

सोमवार, 13 जून 2011

मेरी जानी सी अंजान प्रेमिका ...

ग़ज़लों का दौर से अलग हट के प्रस्तुत है आज एक रचना ... आशा है आपको पसंद आएगी ...

मेरे तमाम जानने वालों के ख्यालों में पली
गुज़रे हुवे अनगिनत सालों की वेलेंटाइन
मेरी अंजान हसीना
समर्पित है गुलाब का वो सूखा फूल
जो बरसों क़ैद रहा
डायरी के बंद पन्नों में

न तुझसे मिला
न तुझे देखा
तू कायनात में तब आई
मुद्दतों बाद जब सूखा गुलाब
डायरी से मिला

मेरी तन्हाई की हमसफ़र
अंजान क़िस्सों की अंजान महबूबा
ख्यालों की आडी तिरछी रेखाओं में
जब कभी तेरा अक्स बनता हूँ
अनायास
तेरे माथे पे बिंदी
हाथों में पूजा की थाली दे देता हूँ
फिर पलकें झुकाए
सादगी भरे उस रूप को निहारता हूँ

ओ मेरी जानी सी अंजान प्रेमिका
तु बरसों पहले क्यों नही मिली

सोमवार, 6 जून 2011

जिंदगी वो राग जिसका सम नही है

जी लिया जो ज़िंदगी में कम नही है
लौट के आ जाऊं इतना दम नही है

एक पन्छी आसमाँ में उड़ रहा है
राह में जिसका कोई हमदम नही है

रोज़ की जद्दो-जहद पैदाइशी है
जिंदगी वो राग जिसका सम नही है

अनगिनत हैं लोग पीछे भी हमारे
बस हमारे हाथ में परचम नही है

किसके जीवन में कभी ऐसा हुवा है
साथ खुशियों के रुलाता गम नही है

बन गया मोती जो तेरा हाथ लग के
अश्क होगा वो कोई शबनम नही है

जिंदगी गुज़री है कुछ अपनी भी ऐसे
साज़ है आवाज़ है सरगम नही है