गुरुवार, 25 अगस्त 2011

आह्वान ...

कब तक शब्दों को
विप्लव की रचनाओं में उतारोगे

शब्द से रचना
रचना से संग्रह
संग्रह से किताब
किताब से संग्रहालय
आंत्र-जाल
या कोई अखबार

दम घोंटू
जंग खाई अलमारियों में
फर्नेल की बदबू से जूझती
सीलन लगी किताबें
फफूंद लगे शब्द
अब सड़ने लगे हैं
मकड-जाल में फंसे मायनों की
साँस उखड़ने लगी है

इससे पहले की
दीमक शब्दों को चाट जाए
शब्दों से गिर के अर्थ
आत्महत्या कर लें
इन्हें बाहर लाओ
चमकती धूप दिखाओ
युग परिवर्तन की हवा चलाओ
शब्दों को ओज़स्वी आवाज़ में बदल डालो
क्रान्ति का इंधन बना दो

क्या हुवा जो कुछ समय के लिए
काव्य सृजन न हुवा
इतिहास की वीथियों में
संगृहीत शब्दों की आवाजें
गूंजती रहेंगी सदियों तक

गुरुवार, 18 अगस्त 2011

प्रश्न ...

इतिहास के क्रूर पन्नों पे
समय तो दर्ज़ करेगा
हर गुज़रता लम्हा
मुँह में उगे मुहांसों से लेकर
दिल की गहराइयों में छिपी क्रांति को
खोल के रख देगा निर्विकार आईने की तरह

अनगिनत सवाल रोकेंगे रास्ता
तेरी मेरी
हम सबकी भूमिका पे

जो तटस्थ रहेंगे
या लड़ेंगे
समय तो लिखेगा
उन सब का इतिहास

क्या सामना करोगे इन सवालों का
सृष्टि के रहने तक
युग के बदलने तक

भविष्य में उठने वाले इन प्रश्नों का जवाब
वर्तमान में ही देना होगा
क्या अब भी सोते रहोगे...?