बुधवार, 14 मार्च 2012

न ज़ख्मों को हवा दो ...

न ज़ख्मों को हवा दो
कोई मरहम लगा दो

हवा देती है दस्तक
चरागों को बुझा दो

लदे हैं फूल से जो
शजर नीचे झुका दो

पडोसी अजनबी हैं
दिवारों को उठा दो

मुहब्बत मर्ज़ जिनका
उन्हें तो बस दुआ दो

मेरी नाकामियों को
सिरे से तुम भुला दो

जुनूने इश्क में तो
फकत उनसे मिला दो