सोमवार, 16 अप्रैल 2012

दीदी के पीहर आते ही अब्बा हो जाता हूँ ...


छू लेती है जब मुझको तो अच्छा हो जाता हूँ  
अम्मा से जब मिलता हूँ तो बच्चा हो जाता हूँ  

करता हूँ अब्बा से छुप कर जब कोई शैतानी 
चहरे को मासूम बना के सच्चा हो जाता हूँ 

राखी या होली दीवाली या लोहडी बैसाखी  
दीदी के पीहर आते ही अब्बा हो जाता हूँ 

दस्तक जब देता हूँ बीती यादों के कमरे में 
दीवारों की सीलन से मैं कच्चा हो जाता हूँ 

खाँसी करता रहता हूँ जब बेटे की बैठक में 
उजली सी दीवारों का मैं धब्बा हो जाता हूँ