रविवार, 5 अगस्त 2012

कैसी है तेरी सरहद ...


कविताओं के दौर से निकल के पेश है आज एक गज़ल ... आशा है पसंद आएगी ...

चाहे मेरा जितना कद  
पर बापू तू है बरगद  

बंटवारे का खेल हुवा 
खींची अपनी अपनी हद     

बेटे ने बस पूछ लिया  
अम्मा है कितनी गदगद   

जूते चप्पल चलते हैं 
कैसी है अपनी संसद 

अंदर आना नामुमकिन   
कैसी है तेरी सरहद